हाई कोर्ट ने डीटीसी पर लगाया एक लाख का जुर्माना, 32 साल तक बकाया वेतन के मामले में लड़ता रहा मुकदमा

News Desk
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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बस कंडक्टर को 17 माह के बकाया वेतन के भुगतान से जुड़े मामले में 32 वर्ष तक मुकदमा लड़ने पर दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि इतने लंबे समय तक सीमित दावे को लेकर मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इससे सार्वजनिक धन की अनावश्यक बर्बादी हुई।

अदालत ने डीटीसी की ओर से वर्ष 2004 में औद्योगिक न्यायाधिकरण के कंडक्टर के पक्ष में दिए गए आदेश के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।

साथ ही अदालत ने डीटीसी को यह स्वतंत्रता दी कि वह एक लाख रुपये की लागत उस अधिकारी से वसूल सकती है, जो इतने महत्वहीन विवाद को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार था।

67 रुपये किराया लेने के बाद टिकट नहीं देने का आरोप

मामला नवंबर 1994 का है। डीटीसी के बस कंडक्टर पर तीन यात्रियों से 67 रुपये किराया लेने के बावजूद उन्हें टिकट जारी नहीं करने का आरोप लगा था। इसके बाद कंडक्टर को निलंबित कर दिया गया।

विभागीय जांच में जांच अधिकारी ने उसके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने इससे असहमति जताते हुए उसे सेवा से हटाने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया।

बाद में कंडक्टर को अगस्त 1996 से सेवा से हटाने का आदेश दिया गया। हालांकि, डीटीसी के चेयरमैन-सह-प्रबंध निदेशक ने अपील में इस फैसले को पलट दिया। वर्ष 1998 में कंडक्टर को बिना बकाया वेतन और कम वेतनमान के साथ बहाल करने का निर्देश दिया गया।

2004 में न्यायाधिकरण ने सजा को करार दिया था अवैध

इसके बाद मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण पहुंचा। वर्ष 2004 में न्यायाधिकरण ने सजा को अवैध और आधारहीन करार देते हुए कंडक्टर को नियमित वेतनमान के अनुसार वेतन देने का आदेश दिया। साथ ही अगस्त 1996 से जनवरी 1998 तक के बकाया वेतन का भुगतान करने को कहा।

डीटीसी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। जुलाई 2005 में हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगा दी थी।

हाई कोर्ट ने डीटीसी पर लगाई एक लाख रुपये की लागत में से 25 हजार रुपये दिल्ली हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी, 50 हजार रुपये प्रधानमंत्री राहत कोष और 25 हजार रुपये संबंधित कंडक्टर को देने का निर्देश दिया।

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