नई दिल्ली। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई भारी हिंसा और पुलिस पर हुए हमले को लेकर दिल्ली पुलिस की जांच में कई चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं।
पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार द्वारा गृह मंत्रालय को सौंपी गई विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, संसद घेराव के नाम पर हुई इस हिंसा में सामान्य प्रदर्शनकारियों के साथ-साथ कई शातिर और आदतन अपराधी भी शामिल थे।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, सीसीटीवी कैमरे और चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक (एफआरएस) के ज़रिए जिन 989 लोगों का पुराना आपराधिक रिकार्ड पाया गया उन्हें गिरफ्तार करने के लिए 20 टीमें बनाई गई है। ये सभी हत्या, डकैती, दुष्कर्म और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे संगीन अपराधों के आरोपित हैं।
दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, आयोजकों को केवल जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी, संसद तक मार्च की कोई अनुमति नहीं थी।
बार-बार चेतावनी देने पर भी नहीं माने उपद्रवी
इसके बावजूद उपद्रवियों ने सुरक्षा घेरे (बैरिकेड्स) तोड़े और संसद के करीब पहुंच गए, जिससे सुरक्षा व्यवस्था में हड़कंप मच गया। पुलिस ने बताया कि बार-बार चेतावनी देने के बाद भी जब उपद्रवियों ने पथराव शुरू कर दिया और सरकारी गाड़ियों में तोड़फोड़ की, तब जाकर बल प्रयोग करना पड़ा।
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि उपद्रवियों के हमले में 35 से अधिक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी समेत 240 जवान घायल हुए, बावजूद इसके पुलिस ने काफी समय तक संयम बरता।
पुलिस ने आधुनिक सीसीटीवी कैमरों, एफआरएस और जनता द्वारा बनाए गए वीडियो फुटेज की मदद से ऐसे तत्वों की पहचान की है जो भीड़ का फायदा उठाकर हिंसा फैला रहे थे।

