गाजियाबाद। चलती कार में अल्ट्रासाउंड लैब से भ्रूण लिंग की जांच करने वाले गिरोह को पुलिस की चूक के कारण अगले ही दिन जमानत मिल गई। गिरोह के सरगना का आपराधिक इतिहास होते हुए भी पुलिस इस तथ्य को मुकदमे में शामिल नहीं किया।
पुलिस गर्भपात कराने वालों के साक्ष्य, डाक्टर व अस्पताल की मिलीभगत के साक्ष्य पेश नहीं कर पाई। कई तथ्यों की अनदेखी कर गंभीर धाराएं नहीं लगाई। इन सभी चूक के कारण आरोपित 24 घंटे में ही जेल से बाहर आ गए।
गिरोह का सरगना पहले भी भ्रूण लिंग जांच मामले में जेल जा चुका है। हरियाणा में भ्रूणलिंग जांच को लेकर वहां काफी सख्ती हो गई है। हरियाणा से सटे उत्तर प्रदेश के शहरों में भ्रूण लिंग जा करने वाले गिरोह सक्रिय हो गए हैं।
एक हफ्ते पहले हुई थी गिरफ्तारी
महामाया स्टेडियम फ्लाईओवर के पास एक सप्ताह पहले स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने एक अर्टिगा कार में बागपत निवासी संदीप, बुलंदशहर निवासी तस्लीम उर्फ साहिल राणा, हापुड़ निवासी सलमान और नूरनगर निवासी शाहिद अहमद को गिरफ्तार किया था।
चारों कार में ही चीन निर्मित पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन से 20 हजार रुपये में गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण करते थे। इसके बाद अवैध गर्भपात कराने की व्यवस्था भी गिरोह कराता था। पहले दलाल गर्भवती महिलाओं से संपर्क करते थे। इसके बाद चलती कार के भीतर भ्रूण लिंग करते थे।
प्रत्येक महिला लाने पर दलाल को तीन हजार रुपये का कमीशन दिया जाता था। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2), 318(4), 319, पीसीपीएनडीटी अधिनियम की विभिन्न धाराओं और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम की धारा 34(2) में मुकदमा दर्ज किया।
पिछले साल भी जेल जा चुका है संदीप
ये सभी धाराओं में सात वर्ष से कम सजा का प्रावधान है। संदीप पिछले वर्ष सितंबर में टीला मोड़ थाने से भी भ्रूण लिंग जांच के आरोप में जेल जा चुका है। जेल से छूटने के बाद उसने फिर से भ्रूण लिंग जांच करनी शुरू कर दी। पुलिस ने यह तथ्य मुकदमे में शामिल नहीं किया।
अदालत ने माना कि आरोपितों पर लगी धाराओं में अधिकतम सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। उनका कोई आपराधिक इतिहास प्रस्तुत नहीं किया गया। जिस वजह से अदालत ने अगले ही दिन आरोपितों को जमानत दे दी।
प्रत्येक आरोपित को 40-40 हजार रुपये की दो जमानत और निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया।
इस तरह लग सकती थी गैंग्स्टर
वरिष्ठ अधिवक्ता नसीम चौधरी ने बताया कि गैंग्स्टर एक्ट तब लगाया जाता है जब आरोपित संगठित गिरोह बनाकर आर्थिक लाभ के लिए लगातार अपराध कर रहे हैं। ये आरोपित गैंंग्सटर एक्ट के दायरे में आते थे।
इस आधार पर हो सकती थी गैंग्सटर की कार्रवाई
– गिरोह करीब दो वर्षों से सक्रिय था।
– कार में पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन लगाकर लिंग परीक्षण करता था।
– प्रत्येक महिला से 20 हजार रुपये वसूले जाते थे।
– दलालों का नेटवर्क था।
– डाक्टरों और झोलाछाप चिकित्सकों से संपर्क था
– मुख्य आरोपित संदीप पहले भी इसी तरह के मामले में जेल जा चुका था।
इसलिए मिली जमानत
– आरोपितों पर लगी धाराओं में अधिकतम सात वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।
– आपराधिक इतिहास होते हुए भी अदालत में आपराधिक इतिहास पेश नहीं किया गया।
– गर्भपात करने वाली महिलाओं का साक्ष्य पेश नहीं किए।
– संगठित व बार-बार अवैध नेटवर्क चलाने, फर्जी दस्तावेज, रिकार्ड से छेड़छाड़ की गंभीर धारा नहीं लगाई।
– स्वास्थ्य विभाग ने इस मामले में साक्ष्य उपलब्ध कराने में पुलिस का सहयोग नहीं किया।
