नई दिल्ली।- सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी आवासीय भवन को ऐसे संगठन को किराये पर दिया जाता है जो उसे छात्रों या नौकरीपेशा लोगों के लिए हॉस्टल के रूप में संचालित करता है, तो इस पर जीएसटी नहीं लगाया जाएगा। अदालत ने कहा कि भले ही परिसर का संचालन कोई संस्था करे, लेकिन उसका मूल चरित्र ‘रिहायशी’ ही माना जाएगा और इसे कर-मुक्त श्रेणी में रखना ही न्यायसंगत है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि हॉस्टल भी रहने की सुविधा प्रदान करते हैं, इसलिए उन्हें आवासीय उपयोग से अलग नहीं किया जा सकता। पीठ के अनुसार, यदि ऐसे मामलों में 18% जीएसटी लागू किया जाता है, तो इसका सीधा बोझ छात्रों और युवा पेशेवरों पर पड़ेगा, जबकि छूट का उद्देश्य ही उनकी आर्थिक परेशानी को कम करना है।
यह मामला बेंगलुरु की एक आवासीय संपत्ति से जुड़ा हुआ था, जिसमें कुल 42 कमरे थे। सह-मालिकों ने इसे ‘डी ट्वेल्व स्पेसेस प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी को लीज पर दिया था, जो इस जगह को तीन महीने से लेकर बारह महीने तक के लिए हॉस्टल के रूप में किरायेदारों को उपलब्ध करा रही थी। संपत्ति के मालिकों ने अग्रिम निर्णय प्राधिकरण (AAR) के सामने यह स्पष्ट करने के लिए आवेदन दिया था कि क्या यह सेवा जीएसटी-मुक्त श्रेणी में आती है।
दूसरा मामला — राज्य बार काउंसिल चुनावों में महिला प्रतिनिधित्व पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से कहा है कि आगामी राज्य बार काउंसिल चुनावों में महिलाओं के लिए कम से कम 30% आरक्षण सुनिश्चित किया जाए। शीर्ष अदालत में यह निर्देश उस याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं को अनिवार्य प्रतिनिधित्व दिए जाने की मांग की गई थी।
बीसीआई ने अदालत को बताया कि आरक्षण लागू करने के लिए अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता होगी और कई राज्यों में चुनाव प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है, जिससे तत्काल परिवर्तन संभव नहीं हो पा रहा। इस पर सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि बीसीआई को नियमों की ऐसी व्याख्या करनी चाहिए जिससे महिलाओं को 30% प्रतिनिधित्व मिल सके, चाहे वह पदाधिकारी स्तर पर हो या परिषद की संरचना में।
जब बीसीआई की ओर से सवाल उठाया गया कि क्या पर्याप्त महिला वकील चुनाव लड़ने आगे आएंगी, तो पीठ ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा महिला वकीलों के बीच कराए गए सर्वे का हवाला दिया—जहाँ 83% महिला अधिवक्ताओं ने एससीबीए की सदस्यता लेने की इच्छा जताई थी। इस आधार पर अदालत ने कहा कि महिला वकीलों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना समय की मांग है।

