नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर जो भीड़ दिख रही है, उसमें लोग अपने आप ही नहीं आ रहे, बल्कि उन्हें यहां तक लाने के लिए एक संगठित परिवहन व्यवस्था भी सक्रिय है। प्रदर्शन से जुड़े टेलीग्राम, वॉट्सएप और इंस्टाग्राम ग्रुपों में लगातार संदेश भेजे जा रहे कि किसे कब और कहां से निकलना है।
टेलीग्राम पर 20-20 हजार के टीम ग्रुप
टेलीग्राम पर 20-20 हजार के टीम ग्रुप बने हुए हैं। एक संदेश पहुंचते ही अलग-अलग जगहों से कैब, आटो और रैपिडो बुक कर हजारों लोग प्रदर्शन स्थल की ओर से निकल पड़ते हैं। यही कारण रहा कि सोमवार और मंगलवार को भीड़ अचानक जुट गई। सुबह तक खाली दिख रहा प्रदर्शन स्थल दोपहर में ठसाठस भर गया था।
बड़े पैमाने पर डिजिटल मैनेजमेंट की सक्रियता
प्रदर्शन के आरंभ और 18 जुलाई को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद विशेषकर सोमवार को संसद मार्च के लिए जमा भीड़ की निरंतरता के लिए बड़े पैमाने पर डिजिटल मैनेजमेंट की सक्रियता है।
यह प्रदर्शन से जुड़े व्हाट्सएप, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, सिग्नल, डिस्कॉर्ड समेत इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म ग्रुपों में लगातार संदेश भेज रहा हैं कि किसे कब और कहां से निकलना है। उसके आने-जाने के लिए ऑनलाइन कैब, ऑटो, रैपिडो सहित अन्य साधन भी बुक करा रहा है।
किराए का भुगतान पहले से पेड
अधिकांश मामलों में ऑनलाइन किराए का भुगतान पहले ही कर दिया जा रहा है। जंतर-मंतर पर पहुंचे कई प्रदर्शनकारियों ने बताया कि उन्हें घर या बताए गए स्थान पर यह व्यवस्था मिली।
बातचीत में सामने आया कि सुनियोजित रणनीति के तहत भीड़ को एक साथ जुटाने की बजाय अलग-अलग समय पर नए समूह भेजे गए, यही कारण रहा कि संसद मार्च पर नियंत्रण के लिए दिल्ली पुलिस ने सोमवार और उसके बाद जंतर-मंतर और आसपास के मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास पर समय-समय पर पाबंदियां लगाईं थीं तो माना गया था कि इससे प्रदर्शन स्थल तक प्रनर्शनकारियों आवाजाही कम हो जाएगी, लेकिन कुछ ही घंटों में पुलिस के यह रणनीति बेअसर दिखाई दी।
देर शाम यह भीड़ छंट गई पर, अगले दिन सुबह फिर जमा हो गई और नए सिरे से धरना मंच सज गया। भीड़ एक साथ नहीं पहुंच रही है। रात में मौजूद कई लोग सुबह नहीं दिखते, जबकि सुबह, दोपहर और शाम को नए समूह लगातार पहुंचते रहते हैं।
एक समूह के लौटने के साथ दूसरा समूह प्रदर्शन स्थल पर पहुंच जाता है। साथ ही ऐसे लोग भी आ रहे हैं जो स्वयं आंदोलन के समर्थन में शामिल होने पहुंचते हैं। इससे जंतर-मंतर, जनपथ और आसपास के क्षेत्र में पूरे समय गतिविधियां बनी रहती हैं। इससे दिन-रात जंतर-मंतर और आसपास का इलाका युवाओं से लगातार भरा रहता है, जबकि चेहरे बदलते रहते हैं।
24 घंटे भीड़ बनाए रखने की रणनीति
एक समूह के लौटते ही दूसरा समूह पहुंच जाता है। इससे पूरे दिन और रात भीड़ का स्तर लगभग समान बना रहता है। यह रोटेशन सिस्टम भी उसी डिजिटल वार रूम द्वारा कुशलतापूर्वक मैनेज किया जा रहा है।
मौके पर बातचीत में कई प्रदर्शनकारियों ने बताया कि व्हाट्सएप, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम, सिग्नल, डिस्कॉर्ड और अन्य सोशल प्लेटफॉर्म पर बने ग्रुपों और चैनलों के माध्यम से समय-समय पर संदेश साझा किए जाते हैं। इनमें प्रदर्शन स्थल पहुंचने का समय, स्थान और अन्य जरूरी सूचनाएं दी जाती हैं।
संबंधित की हामी मिलते ही उनके आने-जाने का बंदोबस्त कर दिया जाता है। प्रदर्शन समाप्त होने के बाद लौटने की व्यवस्था भी इसी तरह होती है।
सक्रिय डिजिटल वार रूम
इस व्यवस्था के लिए पेेशेवर लोगों का अत्यंत संगठित डिजिटल वार रूम काम कर रहा है। यह डिजिटल वार रूम न केवल भीड़ और ट्रांसपोर्ट का प्रबंधन कर रहा है, बल्कि पूरे प्रदर्शन की लाजिस्टिक्स, भोजन-पानी की सप्लाई, वालिंटियर्स का समन्वय और प्रचार-प्रसार को भी पूरी तरह नियंत्रित कर रहा है।
इसमें टेक्नोलाजी, मैनेजमेंट और अन्य प्रोफेशनल बैकग्राउंड वाले लोग शामिल बताए जा रहे हैं, जो दिल्ली के अलावा अन्य शहरों आनलाइन सपोर्ट दे रहे हैं। कुछ एनजीओ और संस्थाएं भी इसमें सक्रिय बताई जा रही हैं, लेकिन इनकी सटीक पहचान की स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही है।
लगातार मिल रही बुकिंग
ऑटो और रैपिडो का सर्वाधिक इस्तेमाल हो रहा है। ऐप आधारित कैब चालकों ने बताया कि प्रदर्शन शुरू होने के पहले दिन से उन्हें लगातार जंतर-मंतर और उसके आसपास के क्षेत्रों के लिए बुकिंग मिल रही हैं। अधिकांश बुकिंग में किराया पहले से ऑनलाइन जमा रहता है। उन्हें केवल तय स्थान से यात्रियों को लेकर निर्धारित स्थान तक पहुंचाने के निर्देश मिलते हैं।

