
नई दिल्ली। मां की कोख का कोई मोल नहीं होता, लेकिन जब गरीबी और लाचारी इंसान की किस्मत लिख रही हो, तो ममता भी बिकने को मजबूर हो जाती है।
दिल्ली पुलिस द्वारा हाल ही में भंडाफोड़ किए गए एक अंतरराज्यीय शिशु तस्कर गिरोह की कहानी सिर्फ एक अपराध की फाइल नहीं है, बल्कि यह उन छह मासूम जिंदगियों की चीख है, जिन्हें पैदा होते ही चंद रुपयों के लिए अपनों ने ही पराया कर दिया।
पुलिस ने शिशु तस्कर गिरोह के सदस्यों और अवैध तरीके से गोद लेने वाले दंपतियों के चंगुल से जिन छह शिशुओं को बरामद किया है, उनमें पांच लड़के और एक लड़की शामिल हैं। इन्हें दिल्ली, हरियाणा और मध्यप्रदेश से बरामद किया गया, जिनमें चार आदिवासी और दो अन्य समुदाय के हैं।
पुलिस ने शिशु गृह में रखा
इनके जैविक माता-पिता के बारे में पता लगाने के लिए पुलिस ने इन्हें फिलहाल सिविल लाइंस स्थित पालना (शिशु गृह) में रखवा दिया था, लेकिन 15 दिन बाद भी शिशुओं के जैविक माता-पिता (असली) का कोई अता पता नहीं चलने पर पुलिस ने अब केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा) को कहा है कि वह वैध प्रक्रिया का पालन करने वाले इच्छुक लोगों को गोद दे सकता है।
बता दें कि पकड़ा गया गिरोह गुजरात और राजस्थान के बेहद सुदूर और पिछड़े इलाकों से इन शिशुओं को (प्रति शिशु महज़ 1.5 से दो लाख रुपये में) खरीदकर दिल्ली लाता था और उन्हें दिल्ली-एनसीआर के अलावा पड़ोसी राज्यों में शिशुओंं के लिए तरस रहे नि:संतान दंपतियों को छह से नै लाख रुपये में बेच देता था। जिस समय ये शिशु बरामद हुए थे इनकी उम्र दो से 25 दिन थी। अब ये शिशु 15 से डेढ़ माह के हो चुके हैं।
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन बच्चों के जैविक(असली) माता-पिता को ढूंढना था, जिनके बारे में अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है।
पुलिस अधिकारी का कहना है कि गिरोह का सरगना सायबाभाई घामर उर्फ कालिया गुजरात व राजस्थान से जिन लोगों के जरिये शिशुओं को खरीदकर दिल्ली भेजता था, उससे पूछताछ में उनकी पहचान नहीं हो पा रही है। दरअसल कालिया से नीचे के चेन में कई लोग शामिल थे।
पुलिस अधिकारी का कहना है कि किसी भी मां-बाप के लिए अपनी दो दिन की संतान को बेचना दिल पर पत्थर रखने जैसा है। यकीनन इसके पीछे की वजह भयंकर गरीबी, लाचारी या कोई बड़ी मजबूरी रही होगी।
जिन बच्चों ने अभी ठीक से आंखें भी नहीं खोली हैं, उन्हें यह भी नहीं पता कि उनका मजहब, उनका नाम या उनका घर क्या है। बच्चों को तस्करों के जाल से छुड़ाना पुलिस की प्राथमिकता थी। अब उनका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि इन्हें एक सुरक्षित और प्यार भरा भविष्य मिले।
”पालना” बना नया आशियाना, अब ”कारा” से उम्मीद
फिलहाल पालना में इन शिशुओं को आया और डाक्टरों की देखरेख में ममता और देखभाल मिल रही है, जिससे इनके अपनों ने इन्हें महज़ कुछ रुपयों के लिए महरुम कर दिया था। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में मानवीय कदम उठाया है।
पुलिस ने कारा को पत्र लिखकर कहा है कि जो भी निसंतान दंपती या इच्छुक लोग कानूनी प्रक्रिया के तहत बच्चों को गोद लेना चाहते हैं, वे आगे आ सकते हैं। कानूनी प्रक्रिया के जरिए इन बच्चों को ऐसे घर भेजे जाने की तैयारी है, जहां इन्हें सचमुच का प्यार मिल सके।
कैसे काम करता है कारा
”कारा” भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है, जो देश में बच्चों को गोद लेने की पूरी प्रक्रिया की निगरानी और विनियमन करता है। लोग ”कारा” की आधिकारिक वेबसाइट पर आनलाइन पंजीकृत कर सकते हैंं।
फार्म भरते समय प्राथमिकताएं (जैसे बच्चे की उम्र, लिंग, राज्य आदि) चुननी होती हैं और पंजीकरण के 30 दिनों के भीतर आवश्यक दस्तावेज वेबसाइट पर अपलोड करने होते हैं।
