गरीब बच्चों को स्कूल में दाखिला देना राष्ट्रीय जिम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट

Amit
2 Min Read

 नई दिल्ली। शिक्षा के अधिकार कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सिर्फ कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि देश की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस दिशा में प्रभावी व्यवस्था बनाना सरकारों और प्रशासन का कर्तव्य है।

आरटीई कानून के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित किए जाने के प्रावधान पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में पात्र बच्चों को प्रवेश नहीं मिल पाता, जिससे कानून का उद्देश्य प्रभावित होता है। इस पर अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे नियम और प्रक्रियाएं तय करें, ताकि ईडब्ल्यूएस वर्ग के बच्चों को प्रवेश में किसी तरह की परेशानी न हो।

न्यायमूर्ति पीएम नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने यह भी कहा कि शिक्षा के अधिकार को लागू करना सरकार की जिम्मेदारी है और यदि अभिभावकों को इस अधिकार से वंचित किया जाता है, तो अदालतों को उन्हें त्वरित और प्रभावी राहत उपलब्ध करानी चाहिए।

कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि कई मामलों में माता-पिता को वर्षों तक न्याय के लिए भटकना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरटीई कानून के तहत स्कूलों की जिम्मेदारियों और सरकारी निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने का फैसला किया है।

शीर्ष अदालत ने यह भी दोहराया कि पड़ोस के सभी स्कूलों पर संविधान के अनुच्छेद 21ए और आरटीई कानून के तहत ईडब्ल्यूएस वर्ग के कम से कम 25 प्रतिशत बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है। मामले में अनुपालन की निगरानी के लिए अदालत ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को भी शामिल किया है और उससे रिपोर्ट तलब की है।

Share This Article
Leave a Comment