दलित उत्पीडन पर मीर सिंह बोले- सरकार बनी मूकदर्शक, संविधान पर मंडरा रहा संकट

Amit
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 “न्यायपालिका में जातीय सोच पर मीर सिंह का प्रहार: संवैधानिक अधिकार हो रहे हैं कमजोर”

 राष्ट्रीय सचिव RPI,(अम्बेडकर) मीर सिंह जी

न्यूज़ इंडिया9 के क्राइम एडिटर रोहित कुमार से बातचीत करते हुए मीर सिंह जी ने कहा कि

आपकी जानकारी हेतु अभी हाल ही में दो हादसे, जिसमें एक हादसा मुख्य न्यायाधीश B.R. Gavai सर्वोच्च न्यायालय में किसी केस की सुनवाई के दौरान एक सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील रामकिशोर कुमार द्वारा सीमित सोच का उदाहरण जातीय सोच एवं मानसिकता का 70 वर्ष की आजादी के बाद जो संविधान में एकता एवं समानता का सभी नागरिकों को भारतवर्ष 1947 की आजादी और 1950 में संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं। उनका मूल्य एवं महत्व शून्य कर दिया गया। इस वारदात के दौरान उच्च जाति के समाज के शिक्षित वर्ग के वकील द्वारा, अगर हम संवैधानिक अधिकार मौलिक अधिकार, नैतिक अधिकार, मानव अधिकार, के माध्यम से इसे आधार मानते हैं या मानकर कहना चाहते हैं, तो कांग्रेस के शासनकाल में इन्हें संविधान में इस विशेष वर्ग के जातीय अधिकार को आधार मानकर ही संसद से पारित करवा कर article और act में लागू किया और करवाया गया था। मगर जातीय भेदभाव खत्म नहीं हुआ तो स्वर्गीय राजीव गांधी भूतपूर्व प्रधानमंत्री जी ने तब 1989 में दलित उत्पीड़न अधिनियम बनाया इसके पीछे भी एक कारण था।

इसके पीछे का कारण हमारे दलित समाज की स्वर्गीय बहन फूलन देवी ने जब स्वयं अपने ऊपर हुए यौन शोषण महिला शोषण का स्वयं आगे आगे बढ़कर फैसला लिया और जो किया उसे पूरा विश्व जानता है और उसे पर एक भारतीय सिनेमा में फिल्म भी बनी बैंडिट क्वीन

दलित उत्पीड़न अधिनियम 1989 जब लागू किया गया इस नई प्रक्रिया एवं प्रणाली के अनुसूचित जाति आयोग अनुसूचित जनजाति आयोग सफाई कर्मचारी आयोग अनुसूचित जाति जनजाति संसदीय समिति जिसमें सभी राष्ट्रीय पार्टी के लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य होते हैं। इसके बाद सफाई कर्मचारी आयोग अगर भेदभाव जिंदा है फिर सामाजिक न्याय एवं अधिकारी मंत्रालय का गढ़, जिसमें विशेष कर एक मंत्री (जो दलित उत्पीड़न अधिनियम को दिखेगा बनाया जाता है) वर्तमान में रामदास आठ वाले राज्यसभा मंत्री जी ने यह कार्यभार संभाला हुआ है।

कुछ समय से यह पूरी संवैधानिक व्यवस्था एक मूकदर्शक बन गई है। एक कहावत है महात्मा गांधी के तीन बंदर ना देख सकते हैं ना बोल सकते हैं ना सुन सकते हैं यह आज का वास्तविक सत्य है।

आज जो सरकार केंद्र में है (बीजेपी) उच्च न्यायालय महाराष्ट्र के एक फैसले को लेकर इस एक्ट को खत्म करने का प्रयास किया जिसे सर्वोच्च न्यायालय अधिवक्ता मनोज गोरकेला द्वारा बचाया गया और इसके विरोध से पूरे देश का नागरिक राष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश में आ गया था और मौजूदा सरकार का इस मनसा पर पानी फिर गया था।

दिनांक 6.10.2025 को सर्वोच्च न्यायालय में जो हुआ उसमें (क) समय, (ख) स्थान, (ग)गवाह, (घ) चश्मदीद गवाह सभी मौजूद थे।

कानूनी कार्रवाई का प्रथम चरण संवैधानिक अनुसार प्रथम चरण जो पूरा करना था तुरंत प्रभाव से कस्टडी अरेस्ट पालन किया तो गया मगर दिखावे मात्र भावनात्मक दिखावा, वास्तविकता नहीं। जो देश के प्रधानमंत्री जी का वक्तव्य है मात्र वक्ता, वास्तविकता नहीं, जिसे लेकर समाज के विशेष वर्ग में रोष है समाज के कुछ बुद्धिजीवी वर्ग नेता जो समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं अपनी-अपनी निजी समस्याओं के पदो पर जगह-जगह बैठ के वार्ता उचित कार्यवाही के लिए निवेदन के शब्दों में, विद्रोह के शब्दों में, सरकार के बहिष्कार के शब्दों में, हर व्यक्ति विशेष और नागरिक (दलित वर्ग) अपनी सोच अपनी मानसिकता द्वारा रोष प्रकट कर रहा है। एवं संवैधानिक आधार के आधार पर जो आजादी के बाद बाबा भीमराव अंबेडकर की मेहनत और लगन के कठोर प्रयास से हमें मिला मगर मौजूदा सरकार इस संवैधानिक अधिकार के आधार को भी राष्ट्रद्रोह या देशद्रोह में बदल देगी या बदलने का प्रयास करेगी। जो कि हमारे संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का हत्या होगा और बीते कई वर्षों से हो भी रहा है।

जिस प्रकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीना जा रहा है समानता का अधिकार समानता का संवैधानिक अधिकार संविधान में आर्टिकल 13, 14, 15, 16 में सुनिश्चित किए गए हैं यह सब लगता है कि संविधान में संवैधानिक अधिकारों का निर्णय मात्रा निर्णय बन रह गया है। न्याय और न्याय की परिभाषा से बहुत दूर होते जा रहे हैं और मौजूदा सरकार के कार्यकाल में नए कानून बनाकर इन अधिकारों को एक तरह से समाप्त करने का प्रयास किया गया और किया जा रहा है।

यह समाज की जागरूकता ही है जो इस कानून नियमों अधिनियमों का बहिष्कार कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय में अपील द्वारा और सामाजिक सभाओं में बहिष्कार द्वारा विपक्ष दल की सभी पार्टियों कांग्रेस नेता राहुल गांधी जी ने इस समस्याओं को समझा और समाधान हेतु समाज के आगे आए और अपने सहयोगी दलों और अपनी पार्टी कांग्रेस के माध्यम से सांसद और जनता के बीच इन विषयों को लाइन और नर बताया संविधान बनाया। इन सभी दलों का यह प्रयास सफल हो स्वयं में और हमारी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अंबेडकर) के इस मिशन में हर तरह से शामिल हैं क्योंकि यह प्रयास किसी एक विशेष वर्ग के लिए नहीं है बल्कि नागरिक हित जनहित का है। रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अंबेडकर) जिसे मैं अभी हाल ही में राष्ट्रीय सचिव का पदभार संभाला है मैं अपनी पार्टी के सभी वरिष्ठ पदाधिकारी का आभार प्रकट करता हूं कि मुझे इस लायक समझा मेरा परिचय समाज सेवा का रहा है और आगे भी इस जिम्मेदारी को निभाऊंगा।

दूसरा दलित उत्पीड़न:

स्वर्गीय आईपीएस वाई पूरन कुमार 

सरकारी सूत्रों द्वारा आत्महत्या

आत्महत्या का कारण और आत्महत्या

आत्महत्या यह कानूनी तौर पर अपराध की परिभाषा में आता है दलित समाज के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी वाई पूरू कुमार की आत्महत्या करना और उसका कारण इस पर संवैधानिक तौर पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और करनी चाहिए स्वर्गीय वाई पूरन कुमार जी से मेरी मुलाकात सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले जी के आवास, 11 सफदरजंग रोड पर हुई थी। मैं उस समय मंत्री जी के आवास कार्यालय में लाइसन ऑफिसर के पद पर कार्यरत था। मेरी स्वर्गीय पूरन कुमार जी से इस विषय पर तीन बार बैठक हुई थी। जिसमें विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा आरोप पत्र और भेदभावपूर्ण जांच पर चर्चा हुई।

जो आरोप पत्र उनके विभागीय अधिकारियों द्वारा जो आरोप लगाकर जांच की जा रही थी वह ना तो तर्कसंगत था और ना ही न्याय संगत था। उनके द्वारा दी गई जानकारी में विषय एक मंदिर के प्रोग्राम को लेकर था जिसमें मुख्य अतिथि गृह मंत्री हरियाणा सरकार अनिल विज जी को जाना था जो किसी कारणवश नहीं जा पाए और स्वर्गीय वाई पूरन कुमार जी उनकी अनुपस्थिति में उस समारोह का मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे जो सूत्रों द्वारा बताया गया बाद में जिसे आधार बनाकर कानूनी कार्यवाही की गई।

(क) अगर वह मंदिर असंवैधानिक तौर पर भूमि पर कब्जा करके बनाया गया था।

(ख) वह भूमि विवादित थी तो इस पर कार्यवाही कब्जा करने वालों के विरुद्ध होनी चाहिए। (कानूनी तौर पर) ना कि स्वर्गीय वाई पूरन कुमार पर, जो की गई और आत्महत्या का कारण बनी।

(ग) जिस व्यक्ति विशेष ने या मंदिर के संस्था ने पदाधिकारी ने  जिन्होंने गृह मंत्री को मुख्य अतिथि के रूप में निमंत्रण भेजा था, ना कि स्वर्गीय वाई पूरन कुमार जी को

भारत सरकार के आदेशानुसार भारत सरकार के मंत्री के साथ एक उच्च पुलिस अधिकारी और या एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी होना चाहिए स्वर्गीय वाई पूर्ण कुमार जी ने तो अपने कर्तव्य का पालन किया था। ना की कोई अपराध जिसे अपराध मानकर आरोप पत्र दाखिल किया गया।

आरोप

एक गांव को अनधिकृत मंदिर या तो मंदिर की भूमि को लेकर जो बैठता गैर संवैधानिक एवं न्याय प्रणाली का उपहास मात्र था जो आत्महत्या का कारण बना।

उदाहरण: भेदभाव पूर्ण जांच और विभागीय आदेश दलित उत्पीड़न अधिनियम 1989 के तहत कार्यवाही होनी चाहिए थी। पर यहां स्वर्गीय पूर्ण कुमार को आत्महत्या करने पर प्रशासन ने मजबूर कर दिया आखिर क्यों?

संपूर्ण विश्व जानता है

राम जन्मभूमि के विद्रोह में हजारों मौतें हुई हजारों करोड़ों की सरकारी गैर सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय में दोषी बताया गया उमा भारती जी लालकृष्ण अडवाणी जी और अन्य गणमान्य बीजेपी नेतागण

सर्वोच्च न्यायालय ने सभी को दोष मुक्त कर दिया और यहां एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ए पूरन कुमार जी को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा आखिर क्यों?

अनिल विज भूतपूर्व हरियाणा गृह मंत्री जी ने संगीता कालिया वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के साथ एक बैठक में जो किया था क्या वह भारतीय नारी का अपमान नहीं था कहने को बहुत कुछ है मगर मैं अपने शब्दों को यहीं विराम देता हूं।

 

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