
इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष- सोनिया गांधी ने भारत की मौन विदेश नीति को बताया अन्याय समर्थन
नई दिल्ली। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को लेकर मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि भारत को केवल राजनीतिक हितों के आधार पर नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से फिलिस्तीन के समर्थन में ठोस कदम उठाने चाहिए।
सोनिया गांधी ने सरकार की मौन नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत का रुख इस संघर्ष पर निराशाजनक रहा है और यह देश की पुरानी विदेश नीति से अलग है। उनका कहना है कि विदेश नीति व्यक्तिगत नेताओं के रिश्तों से प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि दुनिया के 193 देशों में से 150 से अधिक देशों ने फिलिस्तीन को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दी है, जबकि भारत ने हाल ही में इजराइल के साथ निवेश समझौता किया और उसके दक्षिणपंथी मंत्री की मेजबानी की। गांधी ने इसे अन्याय के समर्थन के समान बताया।
उन्होंने भारत की पुरानी विदेश नीतियों को याद करते हुए कहा कि भारत हमेशा मानवाधिकारों और न्याय के लिए खड़ा रहा है, जैसे:
1988 में फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देना
1971 में पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार रोकने के लिए हस्तक्षेप करना
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाना
गांधी ने गाजा की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2023 से हिंसा में 55 हजार से अधिक फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए, जिनमें 17 हजार बच्चे शामिल हैं। स्कूल, अस्पताल और घर नष्ट हो चुके हैं, और लोग अकाल जैसी स्थिति में जी रहे हैं।
सोनिया गांधी ने निष्कर्ष निकाला कि अब भारत की असली परीक्षा यह है कि वह मानवाधिकार और न्याय के लिए ठोस कदम उठाता है या नहीं। उनका कहना है कि चुप रहना अन्याय को समर्थन देने के बराबर है।
