ग्रेटर नोएडा- प्रदेश के सबसे आधुनिक शहर के रूप में प्रचारित नगर में एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत के बाद भी प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली कटघरे में है। हादसे को पांच दिन बीत जाने के बाद जांच में जुटी एजेंसियों ने अचानक एक वीडियो फुटेज और एक होटल बिल सार्वजनिक किया है, जिसमें मृतक युवराज मेहता गुरुग्राम के एक क्लब में दोस्तों के साथ पार्टी करते दिखाई दे रहे हैं।
जानकारों और नागरिक संगठनों का आरोप है कि इस तरह के वीडियो सामने लाकर जांच की दिशा को मोड़ने की कोशिश की जा रही है, ताकि प्रशासन अपनी चूक और जिम्मेदारी से बच सके और हादसे का ठीकरा मृतक पर ही फोड़ दिया जाए। आशंका जताई जा रही है कि युवराज को नशे की हालत में वाहन चलाने का दोषी साबित करने की जमीन तैयार की जा रही है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए करीब 38 सेकंड के इस वीडियो में युवराज अपने सहकर्मियों और मित्रों के साथ पार्टी में शामिल नजर आ रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस आयोजन में कुल 49 लोग मौजूद थे। हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कार्यक्रम कंपनी की ओर से आयोजित था या निजी तौर पर दोस्तों ने मिलकर किया था। सामने आए बिल के अनुसार पार्टी का खर्च लगभग 1.96 लाख रुपये बताया गया है। पार्टी शाम सात बजे शुरू हुई थी, जबकि बिल रात करीब दस बजे का है।
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने सवाल उठाए कि क्या अब जांच एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी से ध्यान हटाने के लिए निजी पलों को सार्वजनिक कर रही हैं। एक यूजर ने लिखा कि पद बचाने की जद्दोजहद में अधिकारियों द्वारा जांच को भटकाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, एक अन्य टिप्पणी में कहा गया कि अगर कोई संकट में हो तो प्रशासन बचाने के बजाय कहानी गढ़ने में लग जाता है।
इस पूरे मामले में प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। एक जनवरी को ट्रक की टक्कर से क्षतिग्रस्त नाले की दीवार को 15 दिन तक क्यों नहीं सुधारा गया? हादसे की जगह पर बैरिकेडिंग क्यों नहीं की गई? सड़क की खतरनाक डिजाइन और अवैध खुदाई को समय रहते ठीक क्यों नहीं किया गया? नियमों के उल्लंघन पर बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई और प्राधिकरण की नरमी का कारण क्या था?
इसके अलावा, मौके पर मौजूद पुलिस और आपदा प्रबंधन टीम की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि घटनास्थल पर पहुंचने के बावजूद राहत कार्य प्रभावी ढंग से नहीं किया गया। मदद के लिए आगे आए एक गिग-वर्कर को थाने में बैठाकर दबाव बनाने के आरोप भी लगे हैं, लेकिन इस पर अब तक कोई स्पष्ट कार्रवाई सामने नहीं आई है।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि हादसे के बाद कई दिनों तक कोई वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर क्यों नहीं पहुंचा। आपदा प्रबंधन का अमला लंबे समय तक प्रयास करता रहा, फिर भी एक युवा की जान नहीं बचाई जा सकी। साथ ही, जांच से जुड़े सीसीटीवी फुटेज के लीक होने को लेकर भी जिम्मेदार लोगों की पहचान अब तक नहीं हो पाई है।
यह मामला अब केवल एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और संवेदनशीलता की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।

