डीयू रामजस कॉलेज के छात्रों का नवाचार, फलों के कचरे से बन रहा एथिकल लेदर

News Desk
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नई दिल्ली। जिस फल के छिलके और जैविक कचरे को आमतौर पर बेकार समझकर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, वही भविष्य में फैशन उद्योग का महत्वपूर्ण कच्चा माल बन सकता है। डीयू के रामजस कालेज के छात्रों ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जो न केवल बढ़ते कचरे की समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है, बल्कि पशु-आधारित चमड़ा उद्योग के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को कम करने की दिशा में भी काम कर रही है।

एनैक्टस रामजस का ‘प्रोजेक्ट स्वबुन’ इसी सोच का परिणाम है, जिसके तहत फलों के कचरे से प्लांट-बेस्ड या एथिकल लेदर विकसित किया जा रहा है।

परियोजना का नेतृत्व नमन राजपाल और आस्था निषाद कर रहे हैं, जबकि कनिष्का यादव इसकी अध्यक्ष हैं। आर्यन, दक्षा, वृंदा, ईशा समेत करीब 20 छात्र-छात्राओं की टीम इस परियोजना से जुड़ी हुई है।

क्यों जरूरी है एथिकल लेदर?

भारत का चमड़ा उद्योग 13 अरब डालर से अधिक का माना जाता है और लगातार विस्तार कर रहा है। उद्योग की मांग पूरी करने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में पशुओं की खाल का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार चमड़ा उद्योग केवल पशु कल्याण का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध जल संकट, कार्बन उत्सर्जन, रासायनिक प्रदूषण और वनों की कटाई जैसी समस्याओं से भी है।

दूसरी बड़ी चुनौती: बढ़ता जैविक कचरा

देश के अधिकांश शहर कचरा प्रबंधन की समस्या से जूझ रहे हैं। घरों, बाजारों, जूस की दुकानों और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों से बड़ी मात्रा में फल और खाद्य अपशिष्ट निकलता है। इनमें से अधिकांश कचरा लैंडफिल तक पहुंच जाता है।

आंकड़ों के अनुसार नगर निकायों द्वारा कचरा एकत्र तो कर लिया जाता है, लेकिन केवल 40 से 45 प्रतिशत कचरे का ही स्रोत स्तर पर पृथक्करण हो पाता है। परिणामस्वरूप जैविक कचरा सड़कर मीथेन गैस छोड़ता है, जो जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है।

कैसे काम करता है मॉडल?

प्रोजेक्ट स्वबुन का नवीनतम आयाम ‘सेहर’ फलों के कचरे को उपयोगी उत्पाद में बदलने पर आधारित है। कच्चा माल जैसे केले के छिलके, संतरे के छिलके, आम के छिलके, फलों का गूदा, जूस दुकानों और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों का अपशिष्ट

निर्माण प्रक्रिया

परियोजना के तहत सबसे पहले फलों के छिलकों और अन्य फल अपशिष्ट का संग्रहण किया जाता है। इसके बाद कच्चे माल की सफाई और पृथक्करण कर उपयोगी हिस्सों को अलग किया जाता है। फिर विशेष तकनीक की मदद से सामग्री का प्रसंस्करण कर उसे बायो-मटेरियल में बदला जाता है।

इस बायो-मटेरियल से प्लांट-बेस्ड लेदर शीट तैयार की जाती हैं, जिनका उपयोग बैग, वालेट, बेल्ट और अन्य फैशन उत्पादों के निर्माण में किया जाता है । इस प्रक्रिया में बेकार समझे जाने वाले जैविक कचरे को मूल्यवान उत्पाद में बदला जाता है। पर्यावरणीय परियोजना नहीं है, बल्कि सामाजिक उद्यमिता का भी उदाहरण है।

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