जब आप और हम सो रहे होते हैं, तब दिल्ली की आबोहवा में ‘स्लो प्वाइजन’ घुल रहा होता है। दिल्ली के जानलेवा पीएम 2.5 प्रदूषण के पीछे सबसे बड़ा कारण परिवहन ही है और इसमें भी असली गुनहगार वे भारी ट्रक हैं जो रात ढलते ही शहर की सीमाओं में दाखिल होते हैं।
एयर पल्यूशन एक्शन ग्रुप (ए पैग), आईआईटी दिल्ली और टेरी की एक संयुक्त और चौंकाने वाली रिपोर्ट में सामने आया है कि राजधानी में हर दिन करीब 16,900 भारी कमर्शियल ट्रक एंट्री करते हैं। दिनभर के मुकाबले सुबह और रात के वक्त दिल्ली के कुल परिवहन प्रदूषण में इन ट्रकों की हिस्सेदारी बढ़कर सीधे 61 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
टूवर्ड्स क्लीनर फ्रेट इन दिल्ली: असेसिंग इंटरस्टेट ट्रक एमिशन एंड मिटिगेशन स्ट्रेटेजीज’ शीर्षक से सोमवार को जारी की गई इस रिपोर्ट में दिल्ली आने वाले अंतरराज्यीय भारी वाहनों की आवाजाही, उनसे होने वाले वास्तविक प्रदूषण एवं इसे रोकने के उपायों का अब तक का सबसे सटीक विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में टोल डेटा, जमीनी ट्रैफिक काउंट, ड्राइवरों के सर्वे और वाहनों से निकलने वाले धुएं की जांच की गई।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
- आईआईटी दिल्ली ने हवा-हवाई दावों के बजाय खुद की विकसित ‘वीएस3’ (वर्सटाइल सोर्स सैंपलिंग सिस्टम) तकनीक से सड़कों पर चलते ट्रकों के धुएं का लाइव एक्सरे किया, जिससे इसका कड़वा सच सामने आया।
- दिल्ली आने वाले 50 प्रतिशत से ज्यादा ट्रक सिर्फ चार रास्तों- कुंडली, रजोकरी, बदरपुर और टिकरी टोल प्लाजा से आते हैं।
- 2027 का फार्मूला : अगर साल 2027 तक बीएस छह से नीचे वाले पुराने ट्रकों की नो-एंट्री कर दी जाए तो इस प्रदूषण को 51 प्रतिशत तक तुरंत कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने भविष्य के लिए दी चेतावनी
टेरी और ए पैग के विशेषज्ञों ने साफ चेतावनी दी है कि प्रदूषण राज्यों की सरहदें नहीं देखता। दिल्ली में आने वाले ज्यादातर ट्रक एनसीआर के बाकी राज्यों से आते-जाते हैं। साफ है कि दिल्ली अकेले इस धुएं से पार नहीं पा सकती।
जब तक केंद्र और सभी एनसीआर राज्य मिलकर ‘लो एमिशन जोन’ और इलेक्ट्रिक ट्रकों के साझे रोडमैप पर सख्ती से काम नहीं करेंगे, तब तक दिल्ली को इस दमघोंटू रफ्तार से निजात मिलना नामुमकिन है।
दिल्ली में ट्रकों से प्रदूषण के चौंकाने वाले आंकड़े
दिल्ली में रोजाना औसतन 16,900 हेवी ड्यूटी वाहन प्रवेश करते हैं। एक ट्रक औसतन 2.5 टन (2500 किलो) कार्बन मोनोऑक्साइड प्रतिदिन उत्सर्जित करता है। ट्रकों से होने वाले कुल उत्सर्जन में बीएस-6 ट्रक सबसे कम प्रदूषण फैलाते हैं, जबकि पुराने बीएस-3 और बीएस-4 ट्रक खतरनाक मात्रा में नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड छोड़ते हैं।
रात के समय (रात 10 बजे से सुबह 7 बजे तक) हेवी ड्यूटी वाहनों का पीएम 2.5 उत्सर्जन 60.5 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। पूरे दिन की पीएम 2.5 उत्सर्जन में इंटरस्टेट ट्रक अकेले 52 किलो पीएम 2.5, 3 टन ऑक्सीजन एंड नाइट्रोजन कंपाउंड और 2.5 टन कार्बन मोनोऑक्साइड का योगदान देते हैं।
62 प्रतिशत ट्रक बीएस-6 मानकों का पालन करते हैं, फिर भी पुराने ट्रक कुल पीएम 2.5 उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा जिम्मेदार हैं। यह डेटा दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर भारी वाहनों के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
“प्रदूषण की कोई सीमा नहीं होती। दिल्ली में आने वाले अधिकांश ट्रक एनसीआर के अन्य राज्यों से आते हैं और वहीं लौट जाते हैं। इसलिए, दिल्ली अकेले इस समस्या को हल नहीं कर सकती। इसके लिए पूरे एनसीआर में एक साथ मिलकर ‘लो एमिशन जोन’ लागू करने और ईवी फ्लीट ट्रांसमिशन जैसी नीतियों पर काम करना होगा।”
–डाॅ. अंजू गोयल, एसोसिएट डायरेक्टर, टेरी
“यह अध्ययन अनूठा है क्योंकि यह कागजी दावों के बजाय सड़क पर ट्रकों के वास्तविक उत्सर्जन और आरएफआईडी टोल रिकाWर्ड को जोड़ कर तैयार किया गया है। इस पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।”
-डाॅ. राहुल गोयल, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईटी दिल्ली
