दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला- विवाहेतर संबंधों पर सिविल कार्रवाई संभव

Amit
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दिल्ली- दिल्ली हाईकोर्ट ने विवाहेतर संबंधों से जुड़े एक मामले में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी महिला का वैवाहिक जीवन किसी तीसरे व्यक्ति के हस्तक्षेप के कारण प्रभावित होता है, तो वह उस तीसरे पक्ष—जैसे पति की प्रेमिका—के खिलाफ सिविल कोर्ट में हर्जाने का दावा कर सकती है।

पति की प्रेमिका पर 1 करोड़ का हर्जाना

यह फैसला एक महिला द्वारा दायर उस याचिका पर आया, जिसमें उसने अपने पति की कथित प्रेमिका पर आरोप लगाया कि उसने जानबूझकर उसके वैवाहिक जीवन में दखल दिया, जिससे उसका पति उससे भावनात्मक रूप से दूर हो गया और शादीशुदा रिश्ता टूट गया। महिला ने प्रेमिका से एक करोड़ रुपये का हर्जाना मांगा है।

कोर्ट ने कहा: अपराध नहीं, पर सिविल परिणाम संभव

न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने कहा कि व्यभिचार (adultery) को भारतीय दंड संहिता से अपराध के रूप में हटाया जाना यह संकेत नहीं देता कि ऐसे संबंधों के लिए सिविल परिणाम भी नहीं होंगे। अदालत ने साफ किया कि किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि दूसरे के वैवाहिक रिश्ते में दखल देकर वह खुद को कानूनी ज़िम्मेदारी से बचा सकता है।

जोसेफ शाइन केस का हवाला

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध जोसेफ शाइन फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भले ही विवाहेतर संबंध अब अपराध नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ये रिश्ते पूरी तरह कानून से परे हो गए हैं। ऐसे संबंध अब भी वैवाहिक जीवन में दरार का कारण बन सकते हैं और इससे जुड़े लोग सिविल दायित्वों से नहीं बच सकते।

भारत में एलाइनेशन ऑफ एफेक्शन की स्थिति

न्यायालय ने ‘एलाइनेशन ऑफ एफेक्शन’ को एंग्लो-अमेरिकन कॉमन लॉ की अवधारणा बताया, जिसे भारत में अभी तक स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई है। फिर भी अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में यदि पत्नी यह साबित कर सके कि तीसरे व्यक्ति के कारण उसका वैवाहिक संबंध टूटा, तो वह सिविल कोर्ट में मुआवज़ा मांग सकती है।

पति और प्रेमिका की याचिका खारिज

पति और उसकी प्रेमिका ने मामले को खारिज करने की अपील की थी, जिसे अदालत ने खारिज करते हुए कहा कि याचिका में उठाए गए तर्क सुनवाई के योग्य हैं। अदालत ने प्रेमिका को पक्ष रखने का अवसर देने के निर्देश के साथ मामले की आगे सुनवाई जारी रखने का आदेश दिया।

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