फिटनेस जांच के लिए दूसरे जिलों का रुख करेंगे वाहन मालिक, एटीएस शुरू न होने से संकट

News Desk
3 Min Read

गाजियाबाद। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (मोर्थ) की नई व्यवस्था के तहत हापुड़ और बुलंदशहर में बृहस्पतिवार से आरटीओ कार्यालयों में व्यावसायिक वाहनों की फिटनेस जांच पूरी तरह बंद कर दी गई।

अब इन दोनों जिलों के वाहन स्वामियों को फिटनेस प्रमाणपत्र के लिए अधिकृत ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) वाले दूसरे जिलों का रुख करना पड़ेगा। स्थानीय स्तर पर एटीएस शुरू न होने से परिवहन कारोबार से जुड़े लोगों की परेशानी बढ़ गई है।

मोर्थ ने वाहनों की फिटनेस जांच में पारदर्शिता और एकरूपता लाने के लिए देशभर में चरणबद्ध तरीके से ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए थे।

ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन शुरू नहीं हो सका

इसके तहत 30 जून 2026 तक संबंधित जिलों में एटीएस के माध्यम से फिटनेस जांच की व्यवस्था लागू करने और इसके बाद आरटीओ कार्यालयों में मैनुअल फिटनेस जांच बंद करने की समयसीमा तय की गई थी।

मोर्थ से जारी निर्देशों के अनुपालन में हापुड़ और बुलंदशहर के आरटीओ कार्यालयों में भी फिटनेस जांच बंद कर दी गई। हालांकि दोनों जिलों में निर्धारित समय सीमा तक एक भी अधिकृत ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन शुरू नहीं हो सका।

सूत्रों के अनुसार एटीएस स्थापित करने के लिए कोई आवेदन भी अंतिम रूप तक नहीं पहुंचा, जिसके कारण व्यवस्था लागू होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर जांच की सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी।

इसका सबसे अधिक असर ट्रक, बस, टैक्सी और अन्य व्यावसायिक वाहनों के संचालकों पर पड़ेगा। अब उन्हें फिटनेस प्रमाणपत्र बनवाने के लिए पास के जिलों में जाना होगा, जहां अधिकृत एटीएस संचालित हैं। इससे वाहन मालिकों को अतिरिक्त समय और आर्थिक बोझ उठाना पड़ेगा।

मोर्थ के निर्देशों के अनुपालन में अब दोनों जिलों के संभागीय कार्यालयों में मैनुअल फिटनेस जांच बंद कर दी गई है, अब फिटनेस जांच ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन एटीसी सेंटर पर ही कराई जाएगी।

– प्रमोद कुमार सिंह, आरटीओ, गाजियाबाद संभाग

क्या है ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस)

ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन पर वाहनों की फिटनेस जांच पूरी तरह मशीनों और सेंसर की मदद से होती है। इसमें ब्रेक, सस्पेंशन, स्टीयरिंग, हेडलाइट, व्हील एलाइनमेंट और प्रदूषण समेत विभिन्न तकनीकी मानकों की कंप्यूटरीकृत जांच की जाती है। इससे मानवीय हस्तक्षेप कम होता है और फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनती है।

Share This Article
Leave a Comment