नई दिल्ली- देश में बौद्धों के लिए स्वतंत्र पर्सनल कानून लागू करने की मांग को लेकर एक नई कानूनी बहस छिड़ गई है। बौद्ध संस्थाओं के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर यह दावा किया कि मौजूदा समय में बौद्ध समुदाय पर हिंदू पर्सनल लॉ के प्रावधान लागू होना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन है।
गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में विस्तृत अध्ययन और विशेषज्ञ विचार की आवश्यकता होती है। अदालत ने यह कहते हुए याचिका सीधे तौर पर स्वीकार करने के बजाय इसे विधि आयोग के पास भेज दिया, ताकि आयोग इसे प्रतिनिधित्व के रूप में लेकर मौजूदा कानूनी ढांचे का मूल्यांकन कर सके।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने और संरक्षकता से जुड़े कई प्रावधान बौद्ध परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं। उनका कहना है कि धर्म, संस्कृति और पहचान के लिहाज से बौद्ध समुदाय को एक पृथक इकाई माना जाना चाहिए, और पर्सनल लॉ भी उसी आधार पर निर्धारित होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 25 तकनीकी रूप से बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को हिंदू की श्रेणी में रखता है, जिसके कारण पर्सनल लॉ में भेदभाव की स्थिति बनती है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि ऐसे संवैधानिक प्रावधानों की समीक्षा करना विधि आयोग का दायित्व है, न कि अदालत का।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि वर्तमान में 21वां विधि आयोग समान नागरिक संहिता सहित कई संवेदनशील मुद्दों पर देशभर के विभिन्न समूहों से सुझाव ले रहा है। आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह बौद्ध समुदाय की इस मांग को भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा बनाकर विस्तृत रूप से अध्ययन करे और आवश्यकता होने पर केंद्र सरकार को सुझाव भेजे।
बौद्ध संगठनों का कहना है कि स्वतंत्र पर्सनल लॉ उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा ही नहीं करेगा, बल्कि उन्हें संवैधानिक रूप से स्वायत्त समुदाय के रूप में मान्यता भी देगा। अब आगे की कार्रवाई विधि आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर करेगी।

