
नोएडा: यमुना एक्सप्रेसवे पर महोबा जा रही स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की जलकर दर्दनाक मौत हो गई। इन अभागे लोगों में एक आईटी कंपनी में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर तैनात श्रुति भी थीं। वह अपनी बहन का जन्मदिन मनाने के लिए जालौन के उरई जा रही थीं। श्रुति के मंगेतर मोहित शर्मा IIT दिल्ली में सुपरकंप्यूटर इंजीनियर हैं। दोनों की इसी साल नवंबर में शादी होने वाली थी, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था।
मोहित IIT दिल्ली के ‘परम प्रज्ञा’ प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया था। नम आंखों से मोहित ने बताया कि वह भी श्रुति के साथ जाना चाहता था पर उसने उसे अपने प्रोजेक्ट पर ध्यान देने के लिए कहा। वह उसे कश्मीरी गेट बसअड्डे पर बैठाने आया था। मजाक-मजाक में उन्होंने 50 मिनट तक अपने स्कूटर से बस का पीछा किया और पूरे रास्ते फोन पर उससे बात करता रहा। रात 10:19 बजे उन्होंने गुडनाइट कहने के लिए फोन किया। श्रुति ने घर पहुंचने के बाद उरई से दोबारा फोन करने का वादा किया पर वह फोन कभी नहीं आया।
बस के पीछे स्कूटर से चलता रहा मोहित
गुरुवार सुबह मोहित शर्मा नोएडा सेक्टर 94 के पोस्टमॉर्टम हाउस में थे। मोहित ने बताया कि उन्होंने श्रुति को बुधवार रात 8:40 बजे बस पर बैठाया। उनका मन श्रुति को जाने देने का नहीं था। बस के निकलने के बाद उन्होंने उसे फोन किया और अपने स्कूटर से नोएडा की तरफ बस का पीछा किया। लगभग 22 किलोमीटर तक वे बात करते रहे, जबकि वह स्कूटर पर बस के पीछे-पीछे चल रहे थे।
श्रुति ने वापस लौट जाने की जिद की
डबडबाई आंखों से मोहित ने बताया- प्यार में हम उस व्यक्ति को आसानी से अलविदा नहीं कह पाते जिससे हम जुड़े होते हैं। लगभग 50 मिनट तक यह सफर उनके अलविदा कहने का एक अनचाहा विस्तार बन गया। फिर, श्रुति ने जिद की कि वह वापस लौट जाए। उसने यू-टर्न लिया और IIT दिल्ली के पास अपने घर की ओर चल दिया। रात 10:19 बजे श्रुति ने एक बार फिर फोन किया क्योंकि वह सोने जा रही थी। उसने घर पहुंचने के बाद अगली सुबह उसे फोन करने का वादा किया। यह उनकी आखिरी बातचीत थी।
सात महीने से साथ थे मोहित और श्रुति
यह जोड़ा सात महीने से साथ था। वे एक दूर के रिश्तेदार के जरिये मिले थे। उनके बीच नजदीकी बढ़ी और उन्होंने इसी साल शादी करने का फैसला किया। गुरुवार सुबह करीब 6.30 बजे श्रुति की बहन उरई बस स्टैंड पहुंची। वहां उन्हें ऑपरेटर से पता चला कि बस में आग लग गई थी।
श्रुति की तलाश में भटकता रहा मोहित
श्रुति के परिवार के लगातार आ रहे फोन कॉल्स से मोहित की नींद खुली। उसने जानकारी जुटानी शुरू की और सबसे पहले जेवर के कैलाश हॉस्पिटल पहुंचा। वहां उसे उत्कर्ष नाम के एक गवाह का नंबर मिला और उसने घटना की कड़ियां जोड़नी शुरू कीं। इसके बाद वह श्रुति को ढूंढने और इस बात की पुष्टि का इंतजार करने के लिए एक जगह से दूसरी जगह भागता रहा कि वह जिंदा है।
‘शायद मैं उसे बचा सकता था’
सेक्टर 94 के पोस्टमॉर्टम हाउस में जहां परिवार वाले अपनों की पहचान करने की कोशिश कर रहे थे, मोहित को पिछली शाम की यादें बार-बार आ रही थीं। मोहित ने कहा- हमारी यादें और साथ बिताया गया समय बार-बार मेरे जेहन में आ रहा है। उसका सबसे बुरा डर सच साबित हुआ। जिस विदाई को उसने सिर्फ अगली कॉल तक का समझा था, वह उनके साथ बिताए जीवन का आखिरी पल बन गया। मोहित को यह सोचकर बहुत तकलीफ हो रही है कि शायद जो हुआ उसे बदल सकता था। उन्होंने कहा- मैं भी जाने का प्लान बना रहा था। शायद मैं उसे बचा सकता था।
