नई दिल्ली। 650 करोड़ के दवा एवं चिकित्सा उपकरण खरीद घोटाले की जांच के बीच स्वास्थ्य विभाग ने विजिलेंस को रिपोर्ट सौंपकर केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) की कई खरीद में ओवरप्राइसिंग से इन्कार किया है। विजिलेंस को दी गई रिपोर्ट में जीईएम पोर्टल पर उपलब्ध अन्य सरकारी संस्थानों की खरीद दरों से सीपीए की दरों का मिलान कर खरीद को सही ठहराने की कोशिश की गई है।
इस बीच स्वास्थ्य मंत्री डा. पंकज सिंह के लंबित खरीद प्रक्रियाओं को लेकर प्रमुख सचिव स्वास्थ्य को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने से खरीद व्यवस्था में प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न खड़ा हो गया है। विशेष यह कि कीमतों पर विभाग का बचाव सामने आने के बावजूद खरीद घोटाले में टेंडर, वेंडर चयन, गुणवत्ता और आपूर्ति से जुड़े पहलुओं की जांच जारी है।
स्वास्थ्य मंत्री के नोटिस में लंबित खरीद प्रक्रियाओं को लेकर विभाग से स्पष्टीकरण मांगा गया है। इससे साफ है कि सरकार केवल यह नहीं देख रही कि सामान कितनी कीमत पर खरीदा गया, बल्कि खरीद प्रक्रिया में देरी, निर्णय लेने की प्रक्रिया और अधिकारियों की जवाबदेही को भी परखा जा रहा है।
ऐसे में विजिलेंस को दी गई ओवरप्राइसिंग संबंधी रिपोर्ट और प्रमुख सचिव से मांगा गया स्पष्टीकरण एक ही खरीद व्यवस्था के दो अलग पहलुओं को सामने रखते हैं। विजलेंस को सौपी अपनी रिपोर्ट में स्वास्थ्य विभाग ने ओआरएस की खरीद का उदाहरण देते हुए कहा है कि सीपीए ने 15 लाख ओआरएस सैशे 8.69 रुपये प्रति सैशे की दर से खरीदे, जबकि अन्य सरकारी संस्थानों में समान खरीद 8.74 रुपये प्रति सैशे की दर से हुई।
विभाग का कहना है कि तुलना खुदरा बाजार की दर से नहीं, बल्कि समान उत्पाद की सरकारी खरीद दर से की जानी चाहिए। इसके साथ ही 448 पोर्टेबल डिजिटल एक्स-रे मशीनों की खरीद पर भी विभाग ने ओवरप्राइसिंग के आरोप से इन्कार किया है।
रिपोर्ट के अनुसार सीपीए ने संबंधित माडल 32.98 लाख रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदा, जबकि जीईएम पर दूसरे सरकारी संस्थानों में इसी माडल की खरीद 32.98 से 33.60 लाख रुपये के बीच हुई। अस्पताल ग्रेड बेडशीट के मामले में करीब 90 जीईएम अनुबंधों की तुलना कर विभाग ने संस्थागत खरीद दर सामान्यतः 400 से 500 रुपये प्रति बेडशीट बताई है।
कीमतों की तुलना के आधार पर ओवरप्राइसिंग से इन्कार के बावजूद 650 करोड़ के घोटाले को लेकर खरीद प्रक्रिया से जुड़े सवाल, टेंडर की शर्तें, वेंडर चयन, गुणवत्ता, आपूर्ति और स्टाक प्रबंधन जैसे पहलुओं की जांच अब भी बरकरार हैं।
जांच में यह भी देखा जा रहा है कि खरीदा गया सामान वास्तव में अस्पतालों तक पहुंचा या नहीं और पहुंचने के बाद उसका कितना उपयोग हुआ। विजिलेंस को सौंपी रिपोर्ट से स्वास्थ्य विभाग ने ओवरप्राइसिंग के आरोपों पर अपना पक्ष रखा है, यह अंतिम निष्कर्ष नहीं।
