अंकित शर्मा हत्याकांड में कड़कड़डूमा कोर्ट का फैसला, ताहिर हुसैन समेत पांच आरोपित दोषी करार

News Desk
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पूर्वी दिल्ली। आईबी अधिकारी अंकित शर्मा हत्याकांड में कड़कड़डूमा कोर्ट ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच आरोपितों को दोषी करार दिया है। वहीं, छह अन्य आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत के फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू जांच एजेंसी की वे चूक भी हैं, जिनके कारण अभियोजन सभी आरोपितों के खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। फैसले में अदालत ने जांच और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया में कई गंभीर खामियों का उल्लेख किया है, जिनका लाभ बरी हुए आरोपितों को मिला।

मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीन कुमार सिंह ने आप के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन( दंगे में नाम आने के बाद निष्कासित किया गया), नाजिम, कासिम, जावेद, अनस को दोषी करार दिया गया था। जबकि हसीन उर्फ मुल्लाजी उर्फ सलमान, फिरोज, गुलफाम, शोएब आलम उर्फ बाबी, मुंतजिम उर्फ मूसा और समीर को बरी कर दिया गया था। बरी हुए आरोपितों के मामले में कोर्ट ने कई सवाल उठाए और पुलिस की चूक सामने आयी।

13 दिन तक चुप रहे गवाह पुलिसकर्मी, कोर्ट ने गवाही पर नहीं किया भरोसा

अभियोजन पक्ष के दो गवाह पुलिसकर्मियों ने अदालत में दावा किया कि उन्होंने अंकित शर्मा पर हमला होते देखा था। लेकिन अदालत ने पाया कि घटना के बाद दोनों ने 13 दिन तक न तो अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी और न ही किसी आधिकारिक रिकार्ड में इसका उल्लेख किया। बाद में दिए गए बयानों में हुए बदलाव और देरी को अदालत ने गंभीर माना और उनकी गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना।

शिनाख्त परेड नहीं कराई, पहचान की प्रक्रिया पर उठे सवाल

बरी हुए आरोपितों के मामले में अदालत ने कहा कि पुलिस ने न्यायिक टीआइपी (शिनाख्त परेड) नहीं कराई। कुछ मामलों में गवाहों को पहले ही आरोपितों की तस्वीरें दिखा दी गई थीं। मुख्य गवाहों की पहचान संबंधी गवाही में भी विरोधाभास सामने आए। अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी भीड़ में केवल अधूरी पहचान के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं बने अभियोजन की ताकत

पुलिस ने कुछ आरोपितों से हथियार और खून से सने कपड़े बरामद करने का दावा किया था, लेकिन डीएनए और फोरेंसिक जांच से इन बरामदगियों का हत्या से स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं हो सका। अदालत ने माना कि जब वैज्ञानिक साक्ष्य ही अभियोजन के दावे की पुष्टि नहीं करते, तब केवल पुलिस के दावों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।

घटनास्थल की जांच और साइट प्लान में खामियां

अदालत ने पाया कि घटनास्थल के दस्तावेजीकरण और गवाहों की वास्तविक स्थिति के सत्यापन में भी गंभीर कमियां रहीं। गवाहों के बयान और साइट प्लान में कई विरोधाभास सामने आए। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने गवाहों के बताए स्थानों का पर्याप्त सत्यापन नहीं किया, जिससे अभियोजन का पक्ष कमजोर हुआ।

कई जगहों पर संदेह से आगे नहीं बढ़ सका अभियोजन

अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जिन आरोपितों के खिलाफ साक्ष्यों की मजबूत और पूर्ण श्रृंखला स्थापित नहीं हो सकी, उन्हें संदेह का लाभ दिया गया। अदालत ने कहा कि प्रक्रियागत कमियों और कमजोर साक्ष्यों के कारण अभियोजन उन आरोपितों के खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका। इसी आधार पर छह आरोपितों को बरी कर दिया गया, जबकि जिन पांच आरोपितों के खिलाफ प्रत्यक्ष, परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक साक्ष्यों की मजबूत कड़ी स्थापित हुई, उन्हें दोषी करार दिया गया।

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