प्रशासनिक लापरवाही का शिकार दिल्ली: 10 साल में इमारतों के मलबे में दबीं 120 जिंदगियां, कागजी सर्वे तक सीमित रहा निगम

News Desk
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नई दिल्ली। एक माह पहले 6 सितंबर को सत्य निकेतन में पीजी ढहने के अगले दिन नगर निगम के मेयर प्रवेश वाही ने एलान किया था कि सभी 12 जोन में खतरनाक और जर्जर भवनों का नए सिरे से सर्वे कराया जाएगा।

वहीं, ऐसे भवनों की पहचान कर उनके खिलाफ दिल्ली नगर निगम अधिनियम और अन्य लागू नियमों के तहत तत्काल कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सीमापुरी में अवैध रूप से बने जर्जर मकानों तक निगम की सर्वे करने वाली टीम नहीं पहुंच पाई। अब हादसे के बाद निगम की तरफ से बताया जा रहा है कि यह मकान 25 साल पहले बना था।

कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

स्थानीय लोगों से निगम को पता चला है कि यहां बांग्लादेशी और रोहिंग्या बसे हुए हैं। लेकिन यह नहीं बताया कि उसकी तरफ से अब तक यहां कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

दरअसल, अवैध निर्माण और जर्जर भवन के जाल में राजधानी ऐसी फंस चुकी है, जहां से निकलना काफी टेढ़ी खीर है। यही वजह है कि निगम कार्रवाई के नाम पर आंखों में धूल झोंक रहा है। कार्रवाई की गति की तुलना कछुए से हो रही है।

प्रशासन की सांठगांठ का नतीजा

दिल्ली नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की सांठगांठ का ही नतीजा है कि राजधानी में बिना सुरक्षा मानकों के लगातार अवैध मंजिलें खड़ी होती हैं और लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। पिछले एक दशक में ही इस तरह के हादसों में 120 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं।

पिछले एक महीने में ही यह तीसरी घटना हो गई जिसमें जान चली गई। सत्य निकेतन हादसे के बाद 29 सितंबर को ताहिरपुर में अवैध रूप से बनाई जा रही पहली मंजिल ढह गई, इसमें एक की मौत हो गई थी। इसके बाद अब बुधवार को सीमापुरी में यह घटना सामने आई है।

पूर्वी दिल्ली नगर निगम के पूर्व मेयर श्याम सुंदर अग्रवाल कहते हैं कि इमारतों के ढहने की ये घटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक शह पर हत्या के समान हैं।

साकेत और सत्य निकेतन हादसों की जांच में पता चला था कि स्थानीय लोगों ने अवैध निर्माण की शिकायत एमसीडी को महीनों पहले भेजी थी, लेकिन भ्रष्ट तंत्र ने कोई कार्रवाई नहीं की।

मजिस्ट्रेटी जांच में पाया गया है कि कई मौकों पर इमारत ढहने के बाद अधिकारियों ने पुरानी तारीखों में फर्जी कारण बताओ नोटिस तैयार किए, ताकि कागजों पर अपनी जिम्मेदारी से बचा जा सके।

एमसीडी के निर्माण समिति के चेयरमैन रहे जगदीश ममगांई भी मानते हैं कि अक्सर इस तरह की घटनाओं के बाद तीन-चार दिन तो तेज गति से कार्रवाई चलती है। लेकिन इसके बाद बस आंखों में धूल झोंका जाता है।

मानसून से पहले सर्वे की भी खुली पोल

नगर निगम मानसून से पहले हजारों इमारतों के सर्वे का दावा करता है, लेकिन पूरी दिल्ली में केवल कुछ दर्जनों इमारतों को ही खतरनाक घोषित किया जाता है। सीमापुरी के ई ब्लाक में हर मकान बिना पिलर का है। अधिकतर की हालत जर्जर की है। लेकिन हादसे ने इस सर्वे की भी पोल खोल दी है।

5 सालों में मकान ढहने की प्रमुख घटनाएं

  • 6 सितंबर 26 : सत्य निकेतन में एक पांच मंजिला इमारत गिरने से सात लोगों की मौत
  • 9 जुलाई 26 : रोहिणी में इमारत ढहने से तीन लोगों की मौत
  • 30 मई 26 : साकेत के पास सैदुलाजाब में पांच मंजिला इमारत ढही, छह की जान गई
  • 20 अगस्त 25: दरियागंज में पुनर्निर्माण कार्य के दौरान दीवार व हिस्सा ढहने से तीन मजदूरों की मृत्यु
  • 15 अगस्त25: दरगाह शरीफ पत्ते शाह (पुरानी दिल्ली) परिसर में छत व दीवार गिरने से छह लोगों की मौत हो गई
  • 12 जुलाई 25: वेलकम इलाके में चार मंजिला जर्जर इमारत जमींदोज हुई, जिसमें छह लोगों की जान गई
  • 17 मई 25: पहाड़गंज में निर्माणाधीन बेसमेंट की दीवार ढहने से चार श्रमिकों/ठेकेदार की मौत
  • 19 अप्रैल 25: मुस्तफाबाद में चार मंजिला पुरानी जर्जर इमारत गिरने से 11 लोगों की मौत
  • 28 जनवरी 25: बुराड़ी में अवैध रूप से बनाई जा रही पांच मंजिला इमारत गिरी, पांच लोगों की मौत
  • 3 अगस्त 24: जहांगीरपुरी में तीन मंजिला इमारत ढहने से तीन लोगों की मौत हो गई
  • 24 अगस्त 23: ओखला में निर्माणाधीन बेसमेंट ढहने से दो लोगों की मृत्यु
  • 9 सितंबर 22: आजाद मार्केट में निर्माणाधीन इमारत गिरने से तीन लोगों की मौत
  • 24 जुलाई22: मुस्तफाबाद में इमारत ढहने से एक की मौत और छह घायल
  • 25 अप्रैल 22: सत्य निकेतन में मरम्मत के दौरान तीन मंजिला मकान की छत ढही, दो की मौत
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