दिल्ली सरकार के खर्च पर CAG की सख्त नजर, बिजली सब्सिडी और टेंडर प्रक्रिया में बड़ी गड़बड़ियां

News Desk
8 Min Read

नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा के पटल पर मानसून सत्र के पहले दिन शुक्रवार को 31 मार्च 2023 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के लिए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वार्षिक लेखापरीक्षा (ऑडिट) रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. इस ऑडिट रिपोर्ट में दिल्ली सरकार के विभिन्न विभागों, बिजली सब्सिडी प्रबंधन, ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली और सार्वजनिक उपक्रमों में वित्तीय अनुशासनहीनता, ठेकों के कुप्रबंधन और करोड़ों रुपये के फिजूलखर्च का विस्तृत ब्योरा दिया गया है.

सीएजी रिपोर्ट ने पाया कि वित्तीय वर्ष 2022-23 के दौरान दिल्ली सरकार के 49 विभागों की कुल 784 ऑडिट योग्य इकाइयों में से 240 इकाइयों (लगभग 30.61 प्रतिशत) का अनुपालन ऑडिट किया गया, जिसमें 45.12 करोड़ रुपये के मौद्रिक प्रभाव वाले कई गंभीर मामले उजागर हुए हैं.

बिजली सब्सिडी: बिना लक्ष्य तय किए सब्सिडी वितरण से बढ़ा बोझ

सीएजी रिपोर्ट में ‘दिल्ली सरकार द्वारा बिजली सब्सिडी का प्रशासन’ विषय पर विस्तृत अनुपालन समीक्षा शामिल है. इस रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि दिल्ली में बिजली सब्सिडी वर्ष 2019-20 में 2,405.59 करोड़ रुपये थी, जो तीन वर्षों में 31 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी के साथ वित्तीय वर्ष 2022-23 में 3,161 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. दिल्ली सरकार के कुल राजस्व व्यय का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा केवल सब्सिडी पर खर्च हो रहा.

सीएजी रिपोर्ट में बताई गईं मुख्य गड़बड़ियां

सरकार की सब्सिडी नीति सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखे बिना लगभग पूरे घरेलू उपभोक्ता आधार को कवर करती है. 0 से 400 यूनिट तक की उच्च थ्रेशोल्ड सीमा तय करने का कोई ठोस रिकॉर्ड या तर्क उपलब्ध नहीं था.

ऑडिट से स्पष्ट हुआ कि अधिक खपत करने वाले वर्ग (200 यूनिट से अधिक की खपत करने वाले लगभग 16.60 लाख उपभोक्ता) प्रति कनेक्शन औसतन ₹10,000 से अधिक की सब्सिडी प्राप्त कर रहे थे, जबकि 0-200 यूनिट खपत करने वाले 30 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को औसतन 6,000 रुपये प्रति कनेक्शन सब्सिडी मिली.

शून्य खपत वाले बंद पड़े कनेक्शनों को सब्सिडी

50,000 से अधिक ऐसे उपभोक्ताओं को 17.81 करोड़ की सब्सिडी दी गई, जिनकी बिजली खपत लगातार 12 महीने से शून्य थी. 90,000 से अधिक उपभोक्ताओं (6 से 11 महीने शून्य खपत) को 11.88 करोड़ की सब्सिडी मिली. 1,70,000 उपभोक्ताओं (3 से 5 महीने शून्य खपत) को 12.57 करोड़ रुपये दिए गए. निष्क्रिय/बंद पड़े कनेक्शनों पर यह खर्च पूरी तरह से व्यर्थ साबित हुआ.

रेगुलेटरी एसेट्स का दबाव: वर्ष 2014-15 के बाद बिजली दरों में बढ़ोतरी न होने से बिजली खरीद की वास्तविक लागत व वसूली के बीच भारी अंतर आ गया. डिस्कॉम का अनरिकवर्ड खर्च बढ़ता गया. दिल्ली डिस्कॉम के रेगुलेटरी एसेट्स वर्ष 2019-20 के 9,063 करोड़ रुपये से बढ़कर 31 मार्च 2021 तक 27,200.37 करोड़ रुपये पर पहुंच गए.

ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम: गंभीर तकनीकी खामियां और फर्जीवाड़े की आशंका

दिल्ली सरकार की ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली में सीएजी ने व्यापक खामियां और सुरक्षा संबंधी चूक पकड़ी हैं.

  • कुल 50,903 पंजीकृत बोलीदाताओं में से 66 बोलीदाताओं को अनिवार्य पैन नंबर दर्ज किए बिना ही सिस्टम में पंजीकरण की अनुमति दे दी गई. इनमें से 12 बोलीदाताओं ने 530.25 करोड़ के 28 टेंडरों में भाग भी लिया.
  • 45 निविदाओं में कंपनियों ने एक ही (कॉमन) पैन का उपयोग करके बोलियां लगाईं, जिससे बोलीदाताओं के बीच गुप्त सांठगांठ का संदेह उत्पन्न होता है. इसके अतिरिक्त, 12,283 बोलीदाताओं ने सिर्फ 5,658 ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया. 38 टेंडरों (मूल्य 2.52 करोड़ रुपये) में एक ही ईमेल से सभी बोलियां लगाई गईं.
  • 3,217.44 करोड़ रुपये मूल्य के 7,181 टेंडरों में बोलीदाताओं ने एक ही आईपी एड्रेस का इस्तेमाल किया, जो विभिन्न बोलीदाताओं व विभागीय उपयोगकर्ताओं के बीच हितों के टकराव की ओर इशारा करता है.
  • सेवानिवृत्ति के बाद भी विभागीय उपयोगकर्ताओं द्वारा लॉगिन करना, अमान्य डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफ़िकेट से दस्तावेज़ अपलोड करना और तकनीकी मूल्यांकन से पहले ही वित्तीय लिफाफों का डिक्रिप्शन जैसी गंभीर खामियां पाई गईं.

विभिन्न विभागों में अनुचित व्यय एवं वित्तीय नुकसान

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग (जीटीबी अस्पताल): अनुबंध में शर्तों के उल्लंघन के कारण 1.93 करोड़ रुपये का अनावश्यक भुगतान करना पड़ा. जीटीबी अस्पताल ने 224 नर्सिंग अर्दली व ग्रुप ‘डी’ कर्मचारियों के लिए मेसर्स सर्वेश सिक्योरिटीज के साथ समझौता किया था. न्यूनतम मजदूरी की संशोधित दरों के अनुसार भुगतान न करने से मामला अदालत में पहुंचा और अंततः अस्पताल को ब्याज व मुआवजे के साथ अनुचित भुगतान करना पड़ा.

उद्योग विभाग: बापरोला में 137.63 एकड़ भूमि पर जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क व फैशन डिज़ाइन हब बनाने के लिए 2006 में 99 साल के लीजहोल्ड अधिकार प्राप्त किए गए थे. 18 साल बीत जाने के बाद भी भूमि के 59 प्रतिशत हिस्से (81.42 एकड़) का कोई उपयोग तय नहीं हो सका, जिसके चलते 29.45 करोड़ रुपये का निष्फल व्यय हुआ. इसके अलावा, 15.79 करोड़ रुपये का बकाया वार्षिक ग्राउंड रेंट का दायित्व भी निर्मित हो गया.

लोक निर्माण विभाग: डीवाटरिंग से संबंधित कार्यों में अनुमानित मात्रा का सही आकलन न करने व वित्तीय सतर्कता न बरतने के कारण स्वीकृत सीमा से अधिक विचलन हुआ. इसके परिणामस्वरूप बाजार दरों पर 5.63 करोड़ रुपये का अनावश्यक अतिरिक्त भुगतान किया गया.

परिवहन विभाग: डीटीसी कर्मचारी भविष्य निधि ट्रस्ट द्वारा अप्रैल 2020 से मार्च 2023 के दौरान कर्मचारियों के पीएफ योगदान के अधिशेष धन का समय पर निवेश न करने के कारण 5.50 करोड़ रुपये के ब्याज का सीधा नुकसान हुआ.

शहरी विकास विभाग (दिल्ली जल बोर्ड): ऑपरेशन एवं मेंटेनेंस कार्यों के लिए कम दर वाले सार्वजनिक उपयोगिता टैरिफ (6.25 रुपये/kVAh) की सुविधा होने के बावजूद निजी एजेंसी के नाम पर बिजली कनेक्शन लिया गया, जिससे गैर-घरेलू श्रेणी (8.50 रुपये/kVAh) के तहत 1.56 करोड़ रुपये का अनावश्यक बिजली बिल भुगतान करना पड़ा.

दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड: दिल्ली जल बोर्ड में जूनियर इंजीनियर के पदों के लिए भर्ती परीक्षा आयोजित करने पर 1.05 करोड़ रुपये का व्यर्थ व्यय किया गया, जबकि जल बोर्ड द्वारा रिक्तियों को वापस लेने की पूर्व सूचना दी जा चुकी थी.

सीएजी की इस रिपोर्ट ने दिल्ली सरकार के सार्वजनिक वित्त प्रबंधन, सब्सिडी वितरण प्रणाली व पारदर्शी खरीद प्रक्रियाओं के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि सरकार को अपने ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम में सख्त इंटरनल कंट्रोल लागू करने, सब्सिडी को सिर्फ जरूरतमंदों तक सीमित करने व विभिन्न विभागों में वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है.

Share This Article
Leave a Comment