गाजियाबाद। करीब 25 साल पुराने इलाहाबाद बैंक कार लोन घोटाले में सीबीआई की विशेष अदालत ने आरोपित हरपाल सिंह आहूजा को दोषी ठहराते हुए चार माह 24 दिन की सजा और पांच लाख रुपये जुर्माना लगाया है। आरोपित ने अदालत में अपना जुर्म स्वीकार कर प्ली बार्गेनिंग के तहत मुकदमे का निस्तारण कराने की अर्जी दी थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
क्या है मामला?
सीबीआई के अनुसार वर्ष 2001 में इलाहाबाद बैंक ने शिकायत दी थी कि नोएडा शाखा में कुछ अधिकारियों और अन्य लोगों ने मिलकर फर्जी तरीके से कार लोन पास किए और बैंक को लाखों रुपये का नुकसान पहुंचाया। जांच में सामने आया कि हरपाल सिंह आहूजा के नाम पर भी 4.90 लाख रुपये का कार लोन लिया गया।
आरोप है कि बैंक से जारी चेक का गलत इस्तेमाल कर रकम निकाल ली गई। इससे बैंक को नुकसान हुआ। मामले में वर्ष 2005 में आरोप तय हो गए थे, लेकिन सुनवाई के दौरान हरपाल सिंह आहूजा फरार हो गया। अदालत ने उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कर दिया।
वर्ष 2013 में बाकी आरोपितों के खिलाफ फैसला आ गया, जबकि हरपाल का मुकदमा अलग चलता रहा। आखिरकार 13 मार्च 2026 को उसे गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। गिरफ्तारी के बाद आरोपित ने अदालत से प्ली बार्गेनिंग के तहत मामले का निपटारा करने की मांग की।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने बताया कि आरोपित 70 वर्ष का है। वह उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, हर्निया तथा घुटनों की गंभीर बीमारी से पीड़ित है। अदालत ने इन तथ्यों और दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए उसे पहले से जेल में बिताई गई चार माह 24 दिन की अवधि की सजा सुनाई। साथ ही पांच लाख रुपये जुर्माना भी लगाया। जुर्माना नहीं भरने पर उसे पांच माह की अतिरिक्त जेल काटनी होगी।
क्या है प्ली बार्गेनिंग?
आरोपित को मिली राहत आपराधिक मामलों में प्ली बार्गेनिंग ऐसी कानूनी व्यवस्था है, जिसमें आरोपित अपनी मर्जी से अपराध स्वीकार कर मुकदमे का जल्दी निस्तारण कराने का अनुरोध करता है। इसके लिए अदालत यह सुनिश्चित करती है कि आरोपित पर कोई दबाव या लालच नहीं है।
अभियोजन पक्ष और आरोपित के बीच आपसी सहमति बनने पर अदालत सजा तय करती है। यह व्यवस्था केवल उन मामलों में लागू होती है, जिनमें कानून इसकी अनुमति देता है। इस मामले में अदालत ने पाया कि आरोपी प्ली बार्गेनिंग की शर्तों को पूरा करता है। इसलिए उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।
25 वर्ष में कब क्या हुआ?
- वर्ष 2000 में फर्जी कार लोन लेने का आरोप लगा।
- 2001 में इलाहाबाद बैंक की शिकायत पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया।
- 2005 में अदालत ने आरोप तय किए।
- सुनवाई के दौरान आरोपित फरार हो गया और उसके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हुआ।
- 2013 में सह-आरोपितों के खिलाफ फैसला आया, जबकि आरोपित का मुकदमा अलग चलता रहा।
- 13 मार्च 2026 को आरोपित गिरफ्तार हुआ।
- जुलाई 2026 में आरोपित ने प्ली बार्गेनिंग के तहत अपराध स्वीकार किया।
- 18 जुलाई 2026 को अदालत ने चार माह 24 दिन की सजा और पांच लाख रुपये जुर्माना लगाया।

