नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए रेफरेंस पर अपनी राय देते हुए कहा कि भारतीय संविधान में प्रयुक्त कई शब्द भले ही अन्य देशों के संवैधानिक ढाँचों से प्रभावित हों, लेकिन उनका अर्थ, उपयोग और उद्देश्य पूरी तरह भारतीय संदर्भ में विकसित हुए हैं। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हमारा संविधान ब्रिटेन के विपरीत पूरी तरह लिखित स्वरूप में है।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई तथा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए. एस. चंदुरकर की बेंच ने कहा कि कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति-विभाजन की अमेरिकी व्यवस्था राष्ट्रपति के वीटो से प्रभावित होती है, जबकि भारत की संवैधानिक प्रणाली का विकास अपना विशिष्ट मार्ग अपनाता रहा है। पीठ के अनुसार, भारतीय संविधान लगातार विकसित होकर उपनिवेशकालीन ढाँचों को पीछे छोड़ते हुए अपने स्वदेशी चरित्र को और मजबूत कर रहा है।
बेंच ने आगे कहा कि यदि किसी विधेयक को राज्य विधानसभा दोबारा—बिना बदलाव या संशोधित रूप में—राज्यपाल के पास भेजती है, तो राज्यपाल उसे फिर से राष्ट्रपति के विचार हेतु सुरक्षित रख सकते हैं। अनुच्छेद 200 के संदर्भ में अदालत ने स्पष्ट किया कि पहली बार विधेयक प्राप्त होने पर राज्यपाल के पास तीन विकल्प होते हैं—मंजूरी देना, राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना या विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटाना। लेकिन जब बिल दोबारा राज्यपाल के पास आता है, तब उन्हें केवल दो विकल्प ही शेष रहते हैं—या तो वह अपनी सहमति दें या फिर बिल को राष्ट्रपति के पास भेजें।
पीठ का कहना था कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल अपने विवेक से निर्णय लेते हैं और इस चरण पर मंत्रिपरिषद की सलाह का बंधन नहीं होता। हालांकि कोर्ट ने यह भी दोटूक कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चित काल तक रोककर नहीं रख सकते।
इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि 33 विधेयक राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित होने के आधार पर सुप्रीम कोर्ट समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकता। ये लंबित विधेयक मुख्य रूप से तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल से जुड़े हैं।
