आज के आधुनिक दौर में तकनीक, सोशल मीडिया और बदलती जीवनशैली के कारण हमारी दुनिया तेजी से बदल रही है। इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर हमारे बच्चों और किशोरों (Teenagers) पर पड़ रहा है। एक तरफ जहां समाज में मासूम बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध और हिंसा चिंता का विषय हैं, वहीं दूसरी तरफ किशोरावस्था में पनपने वाले प्रेम संबंध और उनसे जुड़ी कानूनी उलझनें भी परिवारों के लिए सिरदर्द बनती जा रही हैं।
इन दोनों बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दों पर समाज की जमीनी हकीकत, कानून की स्थिति और इसके समाधान को विस्तार से समझने के लिए हमारे संवाददाता xxxxx ने दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मनीष कुमार शर्मा से एक विस्तृत और सीधी बातचीत की। आइए, इस विशेष संवाद के जरिए जानते हैं कि बच्चों पर बढ़ते अत्याचारों के पीछे क्या कारण है, किशोरावस्था के रिश्तों का कानूनी सच क्या है, और इससे बचने के लिए समाज, कानून और माता-पिता को क्या कदम उठाने चाहिए।
संवाददाता और अधिवक्ता के बीच विशेष संवाद
संवाददाता: महोदय, आज के समय में अखबारों के पन्ने बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों और दूसरी तरफ किशोरों के बीच बनते रिश्तों (Adolescent Relationships) की खबरों से रंगे होते हैं। सबसे पहले मैं यह समझना चाहूंगा कि कानून की नजर में बच्चों की सुरक्षा और किशोरों के इन रिश्तों की वर्तमान स्थिति क्या है?
अधिवक्ता: आपका यह सवाल आज के समय की सबसे बड़ी और गंभीर जरूरत है। देखिए, अगर हम बच्चों के खिलाफ हिंसा की बात करें, तो हमारे देश में कड़े कानून मौजूद हैं, जैसे पोक्सो अधिनियम (POCSO Act, 2012) और भारतीय न्याय संहिता (BNS)। लेकिन, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर मुकदमों में देरी, फॉरेंसिक जांच की कमियां और समाज का डर जैसी कई बड़ी परेशानियां आज भी बनी हुई हैं।
वहीं, जहां तक किशोरावस्था के रिश्तों (Teenage Relationships) की बात है, तो यह आज के दौर का एक बेहद पेचीदा विषय है। कानून के मुताबिक, देश में आपसी रजामंदी (Consent) की कानूनी उम्र 18 वर्ष है। इसका मतलब यह है कि 18 साल से कम उम्र के किसी भी किशोर के साथ यदि कोई शारीरिक संबंध बनता है, तो कानून की नजर में उसे सहमति नहीं माना जा सकता। भले ही दोनों के बीच आपसी रजामंदी क्यों न हो, इसे गंभीर अपराध माना जाता है।
संवाददाता: अक्सर देखा गया है किशोरावस्था के शुरुआती दौर (जैसे 15 से 17 साल की उम्र) में बच्चे इसे केवल ‘प्यार’ या नासमझी भरा आकर्षण समझते हैं। इसके क्या गंभीर कानूनी और व्यावहारिक नुकसान हो सकते हैं?
अधिवक्ता: नुकसान बहुत बड़े और भयानक हो सकते हैं, जिन्हें हम इन बिंदुओं से समझ सकते हैं:
1.आपराधिक मामले और जेल: यदि किन्हीं कारणों से रिश्ता बिगड़ता है या लड़की के परिवार वाले आपत्ति जताते हैं, तो लड़के के खिलाफ पोक्सो एक्ट (POCSO) जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हो जाता है, जिसमें जमानत मिलना भी बहुत मुश्किल हो जाता है।
2.करियर की बर्बादी: इस उम्र में एक बार आपराधिक रिकॉर्ड (Criminal Record) लग जाने से बच्चे का पूरा भविष्य, उच्च शिक्षा और भी कई सारे रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं।
3.मानसिक आघात: पुलिस थानों और अदालतों के चक्कर काटने से किशोर मानसिक रूप से पूरी तरह टूट जाते हैं। कई बार अवसाद (Depression) या गलत कदम उठाने जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं।
4.सोशल मीडिया का दुरुपयोग: आज के डिजिटल दौर में चैट या तस्वीरें शेयर करना आम है। रिश्ता टूटने पर ब्लैकमेलिंग और डेटा लीक होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
संवाददाता: क्या न्यायपालिका या अदालतों के कुछ ऐसे उदाहरण या फैसले भी हैं जहां इन मामलों में कुछ स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हों?
अधिवक्ता: बिल्कुल। माननीय सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अपने कई फैसलों में यह माना है कि कई बार ऐसे मामले दुर्भावना या शोषण के इरादे से नहीं, बल्कि किशोरावस्था के बचकाने आकर्षण (Teenage Affection) के कारण बनते हैं। अदालतों ने यह टिप्पणी भी की है कि कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए ऐसे मामलों की जांच बहुत संवेदनशील तरीके से होनी चाहिए। हालांकि, चूंकि कानून में उम्र की सीमा 18 वर्ष तय है, इसलिए अदालतें भी कानून के दायरे से बंधी होती हैं। इसलिए बच्चों को खुद और उनके माता-पिता को सतर्क रहना सबसे बड़ा उपाय है।
संवाददाता: जब बच्चों के खिलाफ हिंसा या गलत रिश्तों की बात आती है, तो सरकारें और हमारी संसद इन्हें रोकने के लिए क्या कर रही है?
.अधिवक्ता: सरकार और संसद ने समय-समय पर कानूनों को और अधिक कड़ा बनाया है।
•.मामलों की जल्द सुनवाई के लिए देश भर में विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें बनाई गई हैं।
•बाल यौन शोषण के मामलों में मौत की सजा जैसे सख्त प्रावधान जोड़कर यह संदेश दिया गया है कि अपराध के प्रति कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।
•इसके अलावा बच्चों की सुरक्षा के लिए डिजिटल हेल्पलाइन और डेटाबेस तैयार किए गए हैं। हालांकि, केवल कानून बना देना काफी नहीं है, इसके लिए समाज की मानसिकता बदलना भी जरूरी है।
संवाददाता: आज के समय में माता-पिता के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। माता-पिता को क्या विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि बच्चे गलत रास्ते पर न जाएं और सुरक्षित रहें?
अधिवक्ता: माता-पिता के लिए मेरा सबसे पहला और जरूरी सुझाव है कि वे पुलिस या जज बनने के बजाय बच्चों के ‘पक्के दोस्त’ बनें।
1.डर के बजाय खुला संवाद रखें: अगर माता-पिता घर में हर बात पर बच्चों को डांटेंगे, तो बच्चे अपनी बातें छुपाने लगेंगे। घर का माहौल ऐसा होना चाहिए कि बच्चा अपनी हर बात खुलकर बता सके।
2 गुड टच और बैड टच की सीख: बच्चों को बहुत कम उम्र से ही ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में जानकारी दें ताकि वे किसी भी असहज स्थिति में तुरंत आपको बता सकें।
3.डिजिटल निगरानी रखें: बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन कब और कैसे आ रहा है, इस पर नजर रखें। सोशल मीडिया पर वे किससे बात कर रहे हैं, इसकी सामान्य जानकारी जरूर होनी चाहिए।
4.अत्यधिक सख्ती न बरतें: बच्चों पर बहुत ज्यादा पाबंदियां न लगाएं, क्योंकि ज्यादा दबाव से बच्चे बागी (जिद्दी) हो जाते हैं। उन्हें प्यार से सही और गलत में फर्क समझाएं।
संवाददाता: समाज में इन बुराइयों और अपराधों के खिलाफ सच्ची और असरदार जागरूकता कैसे लाई जा सकती है?
अधिवक्ता: जागरूकता ही हमारी सबसे बड़ी ढाल है:
∆ स्कूलों की भूमिका: स्कूलों में किताबी पढ़ाई के साथ-साथ नैतिक शिक्षा, आत्मरक्षा (Self-defense) और कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। शिक्षकों को भी बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर नजर रखनी चाहिए।
∆ सामुदायिक एकजुटता: समाज को अब चुप्पी तोड़नी होगी। अगर आसपास किसी बच्चे के साथ दुर्व्यवहार या शोषण की आशंका दिखे, तो मूकदर्शक न बनकर तुरंत आवाज उठाएं।
संवाददाता: यदि दुर्भाग्य से किसी बच्चे के साथ ऐसा कोई अपराध होता है या कोई परिवार ऐसी कानूनी उलझन में फंस जाता है, तो उन्हें तुरंत क्या कदम उठाने चाहिए?
अधिवक्ता: यह जानकारी हर नागरिक को होनी चाहिए:
* तत्काल पुलिस शिकायत: घटना की सूचना तुरंत नजदीकी पुलिस थाने में दें। पोक्सो मामलों या आपात स्थिति में 112 (इमरजेंसी नंबर) या महिला एवं बाल हेल्पलाइन 1098 पर तुरंत कॉल करें। याद रखें, कानून के तहत पीड़ित बच्चे की पहचान को गुप्त रखना अनिवार्य है।
* कानूनी मदद लें: यदि स्थिति कानूनी रूप से उलझ जाए, तो बिना देर किए किसी अनुभवी और जिम्मेदार आपराधिक मामलों के वकील (Criminal Lawyer) से संपर्क करें। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से मुफ्त कानूनी सहायता भी ली जा सकती है।
संवाददाता: बहुमूल्य समय और इतनी महत्वपूर्ण कानूनी जानकारी साझा करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
अधिवक्ता: आपका भी बहुत धन्यवाद। समाचार पत्रों के माध्यम से ऐसी जागरूकता फैलती रहे, तो हम अपने बच्चों और समाज को एक सुरक्षित भविष्य दे पाएंगे।
निष्कर्ष
बच्चों का बचपन और किशोरावस्था कच्ची मिट्टी की तरह होती है, जिसे सही आकार देना माता-पिता, समाज और कानून तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है। बच्चों के रिश्तों और उनकी सुरक्षा पर केवल पहरा बैठाने या डर पैदा करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उनके साथ दोस्ताना संवाद स्थापित करना होगा। कानून अपना काम सख्ती से कर रहा है, लेकिन मानवीय समझ, सही मार्गदर्शन और सजगता से ही हम कई बर्बादियों को रोक सकते हैं और एक सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं।

