सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: अंतरराष्ट्रीय कर संधियां देशहित में हों, विदेशी दबाव में नहीं

Amit
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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कर व्यवस्था से जुड़े एक अहम फैसले में भारत की आर्थिक संप्रभुता को सर्वोपरि बताते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की कर संधि या अंतरराष्ट्रीय समझौता राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ही होना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे समझौते विदेशी दबाव में नहीं, बल्कि देश की राजस्व सुरक्षा और निष्पक्ष कर प्रणाली को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने एक कर विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने राजस्व विभाग के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें अमेरिकी निवेश कंपनी टाइगर ग्लोबल को फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बेचने से प्राप्त पूंजीगत लाभ पर भारत में कर चुकाने का निर्देश दिया गया था।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कर संधियों का उद्देश्य निवेश को बढ़ावा देना जरूर है, लेकिन उनका इस्तेमाल कर बचाव या दुरुपयोग के लिए नहीं होना चाहिए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि किसी लेनदेन में वास्तविक व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है, तो कर प्रशासन को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने अंतरराष्ट्रीय कर समझौतों के लिए कुछ मूलभूत सिद्धांत भी गिनाए। उन्होंने कहा कि ऐसी संधियां पारदर्शी, संतुलित और समीक्षा योग्य होनी चाहिए। साथ ही उनमें ऐसे मजबूत प्रावधान होने चाहिए, जिससे जरूरत पड़ने पर भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए समझौते से बाहर निकल सके।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को कर नीति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे यह संदेश गया है कि भारत निवेश के पक्ष में है, लेकिन कर संप्रभुता, राजस्व हित और जनहित से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा।

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