अवैध निर्माण और लापरवाही के खतरे में दिल्ली-एनसीआर, जर्जर इमारतें बन रहीं जानलेवा

News Desk
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नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर में मानसून की दस्तक होते ही जर्जर व अवैध इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहने लगी हैं, जिससे कई मासूमों व बेगुनाह मजदूरों की जान जा चुकी है. साकेत, रोहिणी, जसोला और नोएडा के हालिया हादसों ने राजधानी के शहरी ढांचे की खोखली हो चुकी व्यवस्था को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये हादसे कोई सामान्य प्राकृतिक आपदा नहीं हैं, बल्कि यह भ्रष्टाचार, बिल्डरों के लालच व सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी का नतीजा हैं.

विशेषज्ञों का सीधा आरोप: ‘जिंदा कब्रगाह’ बन रही है दिल्ली

इस गंभीर विषय पर शहरी मामलों के जानकार जगदीश ममगाई ने कहा कि अनियंत्रित अवैध निर्माण व निर्माण सामग्री में गुणवत्ता की भारी कमी ही इन दर्दनाक मौतों की असली वजह है. इसके लिए सिर्फ बिल्डर या कांट्रैक्टर ही नहीं, बल्कि आंखें मूंदे बैठीं संबंधित सरकारी एजेंसियां व उनके कुछ भ्रष्ट अधिकारी भी बराबर के जिम्मेदार हैं, जो रिश्वत के लेन-देन के चक्कर में इन अवैध ढांचों को खड़ा होने देते हैं. सरकार को इस पर सख्त रुख अपनाना होगा.

53 लाख निर्माण सवालों के घेरे में

आंकड़ों की भयावहता को सामने रखते हुए जगदीश ममगांई ने बताया कि दिल्ली में इस समय करीब 55 लाख रिहायशी इकाइयां हैं, जिनमें से पौने दो लाख से ज्यादा के पास तो वैध नक्शे ही नहीं हैं. यानी करीब 53 लाख निर्माण एक तरह से अनधिकृत या अवैध श्रेणी के हैं, जहां नियमों व ऊंचाई का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है. उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि संकरी गलियों (6 से 9 मीटर की सड़कों) पर 17.5 मीटर या उससे ऊंची सात-सात मंजिल की इमारतें खड़ी करना सीधे तौर पर लोगों के लिए ‘जिंदा कब्रगाह’ बनाने जैसा है. क्योंकि बिल्डिंग बायलॉज बनाने वाली संस्था दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और इसे लागू करने वाली स्थानीय दिल्ली नगर निगम (MCD) के बीच तालमेल की भारी कमी है, जिसका फायदा अवैध निर्माण करने वाले उठाते हैं.

इतिहास की गलतियां व अनधिकृत कॉलोनियों का जाल

राजधानी दिल्ली में अवैध निर्माण की जड़ें ऐतिहासिक हैं. सन 1947 में विभाजन के बाद आए शरणार्थियों को बसाने के लिए बिना नक्शे पास कराए 25 से 40 गज के प्लॉटों पर जल्दबाजी में कमरे खड़े किए गए. बाद में 1961-62 में डीडीए का गठन इस उद्देश्य से हुआ था कि वह गरीब व मध्यम वर्ग के लिए सस्ते मकान बनाएगा.

शुरुआती दौर में जनता फ्लैट्स और एलआईजी के जरिए यह हुआ भी, लेकिन आगे चलकर डीडीए महज एक प्रॉपर्टी डीलर बनकर रह गया. जमीनों की नीलामी होने लगी, जिसे सिर्फ बड़े बिजनेस हाउसेज ही खरीद सकते थे. परिणाम ये हुआ कि बाहर से आने वाले गरीब मजदूर झुग्गियों में रहने को मजबूर हुए और मध्यम वर्ग ने कृषि भूमि पर बिना किसी प्लानिंग के 50 से 100 गज के अवैध मकान बनाने शुरू कर दिए, जो आज बारूद के ढेर पर बैठे हैं.

इंजीनियरिंग की दृष्टि से 50% इमारतें हैं ‘बीमार’, नींव कमजोर और ‘रिट्रोफिटिंग’ की अनदेखी

जर्जर इमारतों की रिट्रोफिटिंग करने वाले प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर विनीत लोचन गुप्ता ने इस समस्या का एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू सामने रखा है. उन्होंने बताया कि जिस तरह इंसान बीमार होता है, ठीक उसी तरह इमारतें भी बीमार होती हैं. आज दिल्ली-एनसीआर की लगभग 50% इमारतें ‘बीमार’ श्रेणी में हैं, जिनका समय पर स्ट्रक्चरल ट्रीटमेंट होना अनिवार्य है. लेकिन भारत में ‘पुअर मेंटेनेंस’ और अवेयरनेस की कमी के कारण लोग इसे नजरअंदाज करते हैं.

सिविल इंजीनियर विनीत लोचन के अनुसार इन हादसों के पीछे मुख्यत: तीन बड़ी तकनीकी कमियां हैं

  • कमजोर नींव पर अतिरिक्त मंजिलों का बोझ: शुरुआती दौर में जो नींव महज एक या दो मंजिल के लिए डाली गई थी, बिना उसे वैज्ञानिक रूप से मजबूत किए उसके ऊपर चौथी, पांचवीं और यहां तक कि सातवीं मंजिल भी बना दी जाती है.
  • शुरुआती निर्माण में डिफेक्ट और घटिया सामग्री: मुनाफा कमाने के चक्कर में बिल्डर्स दोयम दर्जे की निर्माण सामग्री लगा देते हैं, जिसके डिफेक्ट कुछ वर्षों बाद बाहर आते हैं.
  • प्लंबिंग लीकेज वाटरप्रूफिंग की कमी: लोग मकान की साज-सज्जा पर खर्च करते हैं, लेकिन प्लंबिंग व वाटरप्रूफिंग को नजरअंदाज कर देते हैं। पाइपलाइनों से होने वाला पानी का रिसाव अंदर ही अंदर सरियों को जंग लगा देता है और कंक्रीट को खोखला कर देता है, जिससे बिल्डिंग की लाइफ 25% से 75% तक घट जाती है.
  • जब मानसून में भारी बारिश होती है, तो यह पानी पहले से कमजोर हो चुकी नींव में बैठ जाता है और पास में कोई भी नया निर्माण या खुदाई शुरू होते ही पुरानी इमारत भरभरा कर ढह जाती है.
  • इंजीनियर्स का साफ कहना है कि दिल्ली को बचाने के लिए अब ‘रिट्रोफिटिंग’ और अनिवार्य स्ट्रक्चरल ऑडिट को कानूनी रूप से लागू करना ही एकमात्र रास्ता बचा है.

साल 2026 की प्रमुख घटनाएं

1. साकेत (सैदुलजाब) हादसा, अवैध निर्माण ने ली 6 होनहारों की जान

30 मई 2026 की शाम 7:45 बजे पश्चिमी मार्ग, साकेत मेट्रो स्टेशन के पास (दक्षिण दिल्ली) 5-मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर अवैध रूप से तोड़-फोड़ व निर्माण चल रहा था. ढांचागत संतुलन बिगड़ने से इमारत का हिस्सा नीचे की कैंटीन पर गिरा, जहां पढ़ाई करने वाले डॉक्टर और इंजीनियर छात्र खाना खा रहे थे. हादसे में 06 लोगों की मौत वो 12 से अधिक घायल हो गये थे.

2. रोहिणी सेक्टर-16 हादसा, बारिश के बीच ढही चार मंजिला इमारत

08 जुलाई 2026 की शाम 4:20 बजे सेक्टर-16, रोहिणी (उत्तर-पश्चिम दिल्ली) में भारी मानसून बारिश के बीच निर्माणाधीन मकान में प्लंबिंग के लिए मुख्य बीम और कॉलम में अंधाधुंध कटिंग व ड्रिलिंग की गई थी, जिससे पूरा ढांचा जमींदोज हो गया. 03 लोगों की मौत हो गई 01 गंभीर रूप से घायल हो गया.

3. जसोला दीवार गिरी, डेमोलिशन के दौरान लापरवाही

10 जुलाई 2026 की दोपहर 1:27 बजे जसोला (दक्षिण दिल्ली) में जर्जर इमारत को बिना सुरक्षा उपकरणों और बिना किसी वैज्ञानिक सपोर्ट के मैन्युअल तरीके से तोड़ा जा रहा था, जिससे भारी दीवार मजदूरों पर ही पलट गई. 01 मजदूर की मौत, 02 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए. ठेकेदार शमशुद्दीन को गिरफ्तार किया गया था.

4. नोएडा सेक्टर-33 हादसा- अथॉरिटी की मार्केट की शटरिंग गिरी

12 जुलाई 2026 की दोपहर 3:45 बजे सेक्टर-33, नोएडा में नोएडा अथॉरिटी की पुरानी मार्केट के ऊपर निर्माण के दौरान कंक्रीट लिफ्ट (क्रेन) का तार टूट गया. भारी बॉक्स सीधे नीचे की शटरिंग और कंक्रीट कॉलम पर गिरा, जिससे पूरा ढांचा ढह गया. हादसे में 03 मजदूर घायल हुए, जिनमें 2 की हालत गंभीर है.

दिल्ली व एनसीआर के ये हादसे यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अब भी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं कसी गई, अवैध निर्माण को वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर नहीं रोका गया और ‘स्ट्रक्चरल ऑडिट व रिट्रोफिटिंग’ जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अनिवार्य नहीं किया गया तो मानसून की हर बारिश दिल्लीवासियों के लिए काल बनती रहेगी.

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