देहरादून में फर्जी दस्तावेजों से सरकारी नौकरी का आरोप, RTI क्लब ने खोले कई चौंकाने वाले राज

Amit
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देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरी और अन्य सरकारी लाभ हासिल करने का एक सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। आरटीआई (RTI) क्लब की उपाध्यक्ष रीटा सूरी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सूचना के अधिकार से प्राप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक करते हुए प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि इन सरकारी अभिलेखों में ऐसी विसंगतियां हैं जो सीधे तौर पर धोखाधड़ी की ओर इशारा करती हैं।

रीटा सूरी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, एक ही परिवार के बच्चों की जन्मतिथियों में व्यावहारिक रूप से असंभव अंतर दिखाया गया है। रिकॉर्ड के मुताबिक, परिवार की दूसरी पुत्री रेनू का जन्म वर्ष 1987 दर्ज है, जबकि ठीक अगली यानी तीसरी पुत्री सपना की जन्मतिथि 1 जनवरी 1988 अंकित है। दो सगे बच्चों के जन्म के बीच महज 5 से 7 महीने का यह अंतर दस्तावेजों की सत्यता पर बड़े सवाल खड़े करता है।

मामले में गंभीर मोड़ तब आया जब चौथी पुत्री बरखा पर नगर निगम देहरादून में ‘मृतक आश्रित’ के आधार पर नौकरी पाने के लिए अलग-अलग दस्तावेजों में भिन्न-भिन्न जन्मतिथियों का उपयोग करने का आरोप लगा। शिकायत के अनुसार, शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और पहचान पत्रों (आधार कार्ड आदि) में दर्ज जन्मतिथियों में साफ अंतर होने के बावजूद उन्हें नौकरी दे दी गई, जिससे नगर निगम के सत्यापन अधिकारियों की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में आ गई है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में रीटा सूरी ने जिला प्रशासन, नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों और स्थानीय पार्षद की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा:

“अगर दस्तावेजों में इतनी स्पष्ट विसंगतियां थीं, तो सत्यापन के समय इन्हें नजरअंदाज क्यों किया गया? इसके अलावा, परिवार के चरित्र प्रमाण पत्र को सत्यापित करने वाले स्थानीय पार्षद की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि सच सामने आ सके।”

आरटीआई क्लब ने इस पूरे प्रकरण की एक उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है ताकि दोषियों की जवाबदेही तय की जा सके। हालांकि, इन आरोपों पर अभी तक नगर निगम या संबंधित परिवार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विभागीय जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगी।

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