घरेलू हिंसा कानून पर दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी: ससुर के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं, महिला की याचिका खारिज

News Desk
2 Min Read

नई दिल्ली। घरेलू हिंसा के मामले में अहम निर्णय सुनाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि घरेलू हिंसा कानून के तहत ससुर को सिर्फ इसलिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वह अपने बालिग बेटे के व्यवहार को नियंत्रित करने में नाकाम रहा।

क्या है कानून में घरेलू हिंसा का मतलब?

महिला की याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून की धारा-तीन के तहत शारीरिक या मानसिक नुकसान होता है, लेकिन इस कानून को लागू करने के लिए पक्षकारों के बीच केवल घरेलू संबंध होना ही काफी नहीं है।

‘बालिग बेटे के व्यवहार के लिए ससुर जिम्मेदार नहीं’

वैवाहिक दुर्व्यवहार में ससुर की कोई भूमिका न पाते हुए पीठ ने कहा कि एक पिता को घरेलू हिंसा के कानून के तहत सिर्फ इसलिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसने अपने बालिग बेटे के व्यवहार को नियंत्रित नहीं किया।

क्या पति-पत्नी के विवाद का पूरा मामला?

महिला ने घरेलू हिंसा के आरोपों पर ससुर के खिलाफ कार्रवाई न करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता का आरोप था कि ससुर ने उसके पति के किसी दूसरी महिला के साथ संबंधों के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की।

महिला नहीं पेश कर सकी पुख्ता सुबूत

अदालत ने कहा कि प्रकरण में सामने आए तथ्यों से ससुर द्वारा घरेलू हिंसा का कोई आधार नहीं बनता है। अदालत ने महिला के इस तर्क को भी ठुकरा दिया कि ससुर का व्यवहार उन्हें अपमानित करने से लेकर, मजाक उड़ाने, बेइज्जती करने जैसा था, लेकिन अदालत ने पाया कि महिला इस संबंध में कोई भी पुख्ता सामग्री अदालत के समक्ष नहीं पेश कर सकी।

Share This Article
Leave a Comment