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यह जीत जनरल की कदापि नहीं!

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पूरा देश भगवामय हो गया है। हर दिशा में मोदी मोदी, नमो नमो ही गूंज रहा है। हो भी क्यों ना जो खुद परिचय के मोहताज से थे आज सांसद हो गए। पूरे देश में कार्यकर्ता से लेकर वोटर तक मोदी मोदी ही जप रहा है। कुछ सीटें तो फंसने के बाद जब निकलीं तो समझ में आ गया कि एकाध को छोड़कर वह सीट फंसी तो प्रत्याशी के स्वयं के कौतुकों से थी और पार हुई मोदी धक्के से। 

हम चर्चा दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश की कर रहे हैं। यहां पूर्व कमिश्नर सत्यपाल सिंह जिनकी बागपत सीट जातिगत उन्माद के भंवर में फंस हिचकोले खा रही थी वह विकास की बयार के चलते अंत में पार हो गई। इस सीट को छोड़कर लगभग सभी फंसी सीटें प्रत्याशियों के व्यवहार, अहंकार व अकर्मण्यता से फंसी थी।
‌ एक बहुत महत्वपूर्ण सीट पर चर्चा के दौरान मतदाता और कुछ नेताओं के विचार आप पाठकों के लिए व देश के नेतृत्व के लिए जानने अति आवश्यक है। यह सीट देश की राजधानी दिल्ली से चंद कदमों की दूरी पर गाजियाबाद लोकसभा है। यह सीट कभी किसी क्षण फंसी हुई महसूस तो नहीं हुई पर यह सीट रोचक बहुत रही। पूरा देश जानता है गाज़ियाबाद से देश के पूर्व सेनाध्यक्ष सेवानिवृत्त जनरल विजय कुमार सिंह चुनाव लड़कर जीते। जीत भी हल्की फुल्की नहीं पांच लाख से अधिक वोटों से हुई। प्राप्त जानकारी के अनुसार टिकट होने से पहले सभी जनप्रतिनिधि व स्थानीय नेतृत्व सबके सब संयमित भाषा में जनरल को चुनाव ना लड़ने के लिए शीर्ष नेतृत्व को सलाह दे आये थे। टिकट के समय राष्ट्रीय कार्यालय के सामने प्रदर्शन भी बहुत हुए। परंतु जब जनरल का टिकट घोषित हो गया तब संगठन भाव में चुनाव में सब जुट गए। बताते हैं कार्यकर्ता का तिरस्कार भी बहुत हुआ परंतु सब ने लगकर मेहनत की। चुनाव लगभग 5 लाख 2 हज़ार वोटों के अंतर से जीता भी गया।
‌ सुनते हैं अब वही सब पुराने ढर्रे जैसा शुरू हो चुका है। नम्बरोत्सुक कार्यकर्ता इस जीत को सीधा-सीधा जनरल की लोकप्रियता बता रहे हैं। वहीं अनुभवी, शांत और दूर की दृष्टि रखने वाला कार्यकर्ता चिंतित है। चिंता की वजह पूछी तो आंकड़ा हैरान करने वाला निकला। ऐसे लोगों का कहना है कि यह जीत आज भी संगठन और प्रधानमंत्री मोदी की जीत है। यह जीत जनरल की कदापि कदापि नहीं है! उनके अनुसार तो जनरल हारे हैं। निश्चित ही चौका देने वाली बात है।
गहराई में जाने पर समझ आया कि पिछली बार 2014 में जब जनरल चुनाव लड़ने आए थे, तब जनरल का किसी से कोई परिचय नहीं था। तब संगठन ने मेहनत कर मोदी लहर की सवारी कराते हुए जनरल को 5 लाख 67 हज़ार से भी ज्यादा वोटों से विजय दिलाई। अब 2019 में जब वोटरों की संख्या लगभग ढाई लाख बढ़ भी गई है। तब संगठन की मेहनत और मोदी लहर की सवारी के बावजूद वोट का अंतर 5 लाख 2 हज़ार के करीब ही रह गया। अर्थात जनरल को जानने के बाद अंतर 65 हजार वोट कम हो गया तथा ढाई लाख में से कोई वोट नहीं मिला। तो समझ में आया कि कैसे मोदी लहर से संगठन ही जीता है और जनरल तो हार ही गए हैं।

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