“पूजा या आडम्बर”(एस्ट्रो शेलेजा)

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नमस्कार पाठको! आपकी दोस्त ऐस्ट्रो शैलज़ा फिर आ गई आपके साथ कुछ रोचक विषयों पर चर्चा करने।
आज इस लेख को लिखने से पहले मेरा मन ये गाना गुनगुना रहा है “मन मेरा मंदिर, शिव मेरी पूजा”।

तो चलिए सबसे पहले समझते हैं पूजा, प्रार्थना,अरदास या प्रेयर क्या है।

जब हम सच्चे दिल से, पूरी श्रद्धा के साथ ध्यान लगाकर उस दैवीय शक्ति को याद करते है, जिस पर हम यकीन करते है, उसमें कोई आडम्बर या ढोंग नहीं होता उसे कहते हैं पूजा, अगर ऐसा मैं बोलूं तो क्या आप मानेंगे ?
शायद 50% मान भी जाएं पर फिर कुछ बुद्धिजीवी बोलेंगे रीतिरिवाज भी कुछ होते है कि नहीं।
वैदिक काल में मूर्ति पूजा का चलन नहीं था। लोग प्रकृति अथार्त जल, वायु, अग्नि आदि को ही ईश्वर रुप मानते थे। यज्ञ करके या ध्यान लगा के अपने सर्वव्यापी ईश्वर को धन्यवाद करते थे।
मध्यकाल के आरंभ मे मूर्ति पूजा का चलन शुरु हुआ। धीरे-धीरे मंदिरों का निर्माण बढ़ने लगा, जोकि कतई गलत नहीं था।
ईश्वर का आशीर्वाद पाने के दो मूलतत्व है पहला सच्ची आस्था, दूसरा ध्यान। हम मानते हैं कि ईश्वर कण- कण में बसा हैं। तो फिर मूर्ति में क्यूं नहीं?
ऐसा ही विचार करते हुए, एकाग्र होकर ध्यान लगाने के लिए ईश्वर के रुप को मूर्तियों में संजोकर मंदिरों में स्थापित किया गया। जहाँ भक्त आकर अपने इष्ट की मूर्ति मे उनके होने का अहसास कर ध्यान में मग्न हो सके। ये एक सकारात्मक कदम था꫰
परंतु सही और गलत का गठबंधन है तो दोनों साथ ही चलते हैं ꫰
नये-नये धर्मों का जन्म होने लगा, उनके अनुयायी नई कलाओं से लोगों को अपने धर्मों की तरफ आकर्षित करने लगे और ये सच है दुनियां दिखावा पसंद करती हैं।
ये इस बात का डर ही रहा होगा जो शांति और ध्यान के लिए बनाए गए मंदिरों को भी नऐ-नऐ आडम्बरों का सहारा लेना पड़ा।
लेकीन आज भी यहीं चलन चला आ रहा हैं। हर धर्म में आस्था के नाम पर दिखावा रह गया है, पूजा के नाम पर बड़े-बड़े टैंट लगवाते हैं, बैंड बाजा बजवाते हैं, पूरा शोरगुल करवाते है परंतु ध्यान कहाँ लगाते हैं? सच्चे मन से एकांत में उस शक्ति पुंज से संपर्क कहा करते हैं?
आज बड़े मंदिरों के बड़े पुजारी खुद को ही भगवान माने होते हैं। केवल आपके अंधविश्वास के कारण। आप बस 50 हजार दें हम आपकी कालसर्प दोष पूजा, गणमूल पूजा, मंगल दोष पूजा कर देंगे बोलकर मोटी रकमें ऐंठी जा रही हैं। आप खुद सोचें जो रोटी आपने खाई नहीं वो आपका पेट कैसे भरेगी?
आप पूजा किजिए, जिसमें आपकी खुशी हो वैसे, लेकिन याद रहे ईश्वर सच्ची भक्ति चाहता है दिखावा नहीं।
आप ईश्वर से दूर हो रहे हैं और पथ भ्रमित किये जा रहे हैं। अंधविश्वास से बाहर आएं। किसी प्रोफेशनल की मदद लें और ध्यान लगाने कि आदत बनाएं।
याद रहे हमारे कर्म ही हमारी आनेवाली नस्लों का निर्माण करेंगे।
आज के लिए इतना ही, ऐसे ही साथ चलते-चलते और नई जानकारी जुटाऐंगे। अगामी लेख में रत्नों के महत्व के बारे में बताऊंगी।

ॐ नमः शिवाय।
Astro Shailjaa
Astrologer, Counsellor, Healer, Gemstones advisor, Numerologist, Astroyog, Vastu tips & Stone therapist.
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